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Rigveda Mandal 7 / Sukta 25 / Mantra 1

104 Sukta
6 Mantra
7/25/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ ते॑ म॒ह इ॑न्द्रोत्यु॑ग्र॒ सम॑न्यवो॒ यत्स॒मर॑न्त॒ सेनाः॑। पता॑ति दि॒द्युन्नर्य॑स्य बा॒ह्वोर्मा ते॒ मनो॑ विष्व॒द्र्य१॒॑ग्वि चा॑रीत् ॥१॥

आ । ते॒ । म॒हः । इ॒न्द्र॒ । ऊ॒ती । उ॒ग्र॒ । सऽम॑न्यवः । यत् । स॒म्ऽअर॑न्त । सेनाः॑ । पता॑ति । दि॒द्युत् । नर्य॑स्य । बा॒ह्वोः । मा । ते॒ । मनः॑ । वि॒ष्व॒द्र्य॑क् । वि । चा॒री॒त् ॥

Mantra without Swara
आ ते मह इन्द्रोत्युग्र समन्यवो यत्समरन्त सेनाः। पताति दिद्युन्नर्यस्य बाह्वोर्मा ते मनो विष्वद्र्य१ग्वि चारीत् ॥

आ। ते। महः। इन्द्र। ऊती। उग्र। सऽमन्यवः। यत्। सम्ऽअरन्त। सेनाः। पताति। दिद्युत्। नर्यस्य। बाह्वोः। मा। ते। मनः। विष्वद्र्यक्। वि। चारीत् ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 1

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Meaning
हे (उग्र) शत्रुओं के मारने में कठिन स्वभाववाले (इन्द्र) सेनापति ! (यत्) जिस (नर्यस्य) मनुष्यों में साधु (महः) महान् (ते) आप के (समन्यवः) क्रोध के साथ वर्त्तमान (सेनाः) सेना (ऊती) रक्षण आदि क्रिया से (आ, समरन्त) सब ओर से अच्छी जाती हैं उन (ते) आप की (बाह्वोः) भुजाओं में (दिद्युत्) निरन्तर प्रकाशमान युद्धक्रिया (मा) मत (पताति) गिरे, मत नष्ट हो और तुम्हारा (मनः) चित्त (विष्वद्र्यक्) सब ओर से प्राप्त होता हुआ (वि, चारीत्) विचरता है ॥१॥
Essence
हे सेनाधिपति ! जब संग्राम समय में आओ तब जो क्रोध प्रज्वलित क्रोधाग्नि से जलती हुई सेना शत्रुओं के ऊपर गिरें, उस समय वे विजय को प्राप्त हों, जब तक तुम्हारा बाहुबल न फैले मन भी अन्याय में न प्रवृत्त हो, तब तक तुम्हारी उन्नति होती है, यह जानो ॥१॥
Subject
अब छः ऋचावाले पच्चीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में कैसी सेना उत्तम होती है, इस विषय को कहते हैं ॥

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