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Rigveda Mandal 7 / Sukta 24 / Mantra 4

104 Sukta
6 Mantra
7/24/4
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ नो॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑ स॒जोषा॒ ब्रह्म॑ जुषा॒णो ह॑र्यश्व याहि। वरी॑वृज॒त्स्थवि॑रेभिः सुशिप्रा॒स्मे दध॒द्वृष॑णं॒ शुष्म॑मिन्द्र ॥४॥

आ । नः॒ । विश्वा॑भिः । ऊ॒तिऽभिः॑ । स॒ऽजोषाः॑ । ब्रह्म॑ । जु॒षा॒णः । ह॒रि॒ऽअ॒श्व॒ । या॒हि॒ । वरी॑वृजत् । स्थवि॑रेभिः । सु॒ऽशि॒प्र॒ । अ॒स्मे इति॑ । दध॑त् । वृष॑णम् । शुष्म॑म् । इ॒न्द्र॒ ॥

Mantra without Swara
आ नो विश्वाभिरूतिभिः सजोषा ब्रह्म जुषाणो हर्यश्व याहि। वरीवृजत्स्थविरेभिः सुशिप्रास्मे दधद्वृषणं शुष्ममिन्द्र ॥

आ। नः। विश्वाभिः। ऊतिऽभिः। सऽजोषाः। ब्रह्म। जुषाणः। हरिऽअश्व। याहि। वरीवृजत्। स्थविरेभिः। सुऽशिप्र। अस्मे इति। दधत्। वृषणम्। शुष्मम्। इन्द्र ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 8 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुशिप्र) उत्तम शोभायुक्त ठोढ़ीवाले (हर्यश्व) हरणशील मनुष्य वा घोड़े बड़े-बड़े जिसके हुए वह (इन्द्र) परम ऐश्वर्य देनेवाले ! (विश्वाभिः) समस्त (ऊतिभिः) रक्षा आदि क्रियाओं से (सजोषाः) समानप्रीति सेवनेवाले (ब्रह्म) धन वा अन्न को (जुषाणः) सेवने वा (स्थविरेभिः) विद्या और अवस्था में वृद्धों के साथ (अस्मे) हम लोगों में (वृषणम्) सुख वर्षानेवाले (शुष्मम्) बल को (दधत्) धारण करते हुए आप दुःखों को (वरीवृजत्) निरन्तर छोड़ो और (नः) हम लोगों को (आ, याहि) आओ, प्राप्त होओ ॥४॥
Essence
वे ही मनुष्य महाशय होते हैं, जो पाप और परोपघात अर्थात् दूसरों को पीड़ा देने के कामों को छोड़ के अपने आत्मा के तुल्य सब मनुष्यों में वर्त्तमान सब के सुख के लिये अपना शरीर, वाणी और ठोढ़ी को वर्ताते हैं ॥४॥
Subject
फिर कौन आप्त विद्वान् होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥