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Rigveda Mandal 7 / Sukta 24 / Mantra 2

104 Sukta
6 Mantra
7/24/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
गृ॒भी॒तं ते॒ मन॑ इन्द्र द्वि॒बर्हाः॑ सु॒तः सोमः॒ परि॑षिक्ता॒ मधू॑नि। विसृ॑ष्टधेना भरते सुवृ॒क्तिरि॒यमिन्द्रं॒ जोहु॑वती मनी॒षा ॥२॥

गृ॒भी॒तम् । ते॒ । मनः॑ । इ॒न्द्र॒ । द्वि॒ऽबर्हाः॑ । सु॒तः । सोमः॑ । परि॑ऽसिक्ता । मधू॑नि । विसृ॑ष्टऽधेना । भ॒र॒ते॒ । सु॒ऽवृ॒क्तिः । इ॒यम् । इन्द्र॑म् । जोहु॑वती । म॒नी॒षा ॥

Mantra without Swara
गृभीतं ते मन इन्द्र द्विबर्हाः सुतः सोमः परिषिक्ता मधूनि। विसृष्टधेना भरते सुवृक्तिरियमिन्द्रं जोहुवती मनीषा ॥

गृभीतम्। ते। मनः। इन्द्र। द्विऽबर्हाः। सुतः। सोमः। परिऽसिक्ता। मधूनि। विसृष्टऽधेना। भरते। सुऽवृक्तिः। इयम्। इन्द्रम्। जोहुवती। मनीषा ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 8 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्य के देनेवाले जो (विसृष्टधेना) नाना प्रकार की विद्यायुक्त वाणी और (सुवृक्तिः) सुन्दर चाल ढाल जिसकी ऐसी (इयम्) यह (मनीषा) प्रिया स्त्री (इन्द्रम्) परमैश्वर्य देनेवाले पुरुष को (जोहुवती) निरन्तर बुलाती है उसको (भरते) धारण करती है जिसने (ते) तेरा (मनः) मन (गृभीतम्) ग्रहण किया तथा जो (द्विबर्हाः) दो से अर्थात् विद्या और पुरुषार्थ से बढ़ता वह (सुतः) उत्पन्न किया हुआ (सोमः) ओषधियों का रस है और जहाँ (परिषिक्ता) सब ओर से सींचे हुए (मधूनि) दाख वा सहत आदि पदार्थ हैं, उन्हें सेवो ॥२॥
Essence
जो स्त्री सुविचार से अपने प्रिय पति को प्राप्त होके गर्भ को धारण करती है, वह पति के चित्त को खींचने और वश में करनेवाली होकर वीर सुत को उत्पन्न कर सर्वदा आनन्दित होती है ॥२॥
Subject
फिर वे स्त्री-पुरुष क्या करके विवाह करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥