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Rigveda Mandal 7 / Sukta 23 / Mantra 5

104 Sukta
6 Mantra
7/23/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ते त्वा॒ मदा॑ इन्द्र मादयन्तु शु॒ष्मिणं॑ तुवि॒राध॑सं जरि॒त्रे। एको॑ देव॒त्रा दय॑से॒ हि मर्ता॑न॒स्मिञ्छू॑र॒ सव॑ने मादयस्व ॥५॥

ते । त्वा॒ । मदाः॑ । इ॒न्द्र॒ । मा॒द॒य॒न्तु॒ । शु॒ष्मिण॑म् । तु॒वि॒ऽराध॑सम् । ज॒रि॒त्रे । एकः॑ । दे॒व॒ऽत्रा । दय॑से । हि । मर्ता॑न् । अ॒स्मिन् । शू॒र॒ । सव॑ने । मा॒द॒य॒स्व॒ ॥

Mantra without Swara
ते त्वा मदा इन्द्र मादयन्तु शुष्मिणं तुविराधसं जरित्रे। एको देवत्रा दयसे हि मर्तानस्मिञ्छूर सवने मादयस्व ॥

ते। त्वा। मदाः। इन्द्र। मादयन्तु। शुष्मिणम्। तुविऽराधसम्। जरित्रे। एकः। देवऽत्रा। दयसे। हि। मर्तान्। अस्मिन्। शूर। सवने। मादयस्व ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 7 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) निर्भय (इन्द्र) सर्व सेना स्वामी ! (हि) जिस कारण आप (एकः) अकेले (देवत्रा) विद्वानों में जिस (जरित्रे) सत्य की स्तुति करनेवाले के लिये जिन भृत्य जनों से (दयसे) दया करते हो (ते) वे (मदाः) आनन्दयुक्त होते हुए अच्छे भट योद्धाजन (शुष्मिणम्) बलयुक्त (तुविराधसम्) बहुत धन-धान्यवाले (त्वा) आप को (मादयन्तु) हर्षित करें आप (अस्मिन्) इस वर्त्तमान (सवने) युद्ध के लिये प्रेरणा में उन (मर्त्तान्) मनुष्यों को (मादयस्व) आनन्दित करो ॥५॥
Essence
हे सर्व सेनाधिकारियों के पति ! आप सर्वदैव सब पक्षपात को छोड़ कृपा करो और सब को समान भाव से आनन्दित करो, जिससे वे अच्छी रक्षा और सत्कार पाये हुए दुष्टों का निवारण और श्रेष्ठों की रक्षा करके निरन्तर राज्य बढ़ावें ॥५॥
Subject
फिर वे सब सेनापति और सब सेनाजन परस्पर कैसे वर्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥