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Rigveda Mandal 7 / Sukta 22 / Mantra 6

104 Sukta
9 Mantra
7/22/6
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
भूरि॒ हि ते॒ सव॑ना॒ मानु॑षेषु॒ भूरि॑ मनी॒षी ह॑वते॒ त्वामित्। मारे अ॒स्मन्म॑घव॒ञ्ज्योक्कः॑ ॥६॥

भूरि॑ । हि । ते॒ । सव॑ना । मानु॑षेषु । भूरि॑ । म॒नी॒षी । ह॒व॒ते॒ । त्वाम् । इत् । मा । आ॒रे । अ॒स्मत् । म॒घ॒ऽव॒न् । ज्योक् । क॒रिति॑ कः ॥

Mantra without Swara
भूरि हि ते सवना मानुषेषु भूरि मनीषी हवते त्वामित्। मारे अस्मन्मघवञ्ज्योक्कः ॥

भूरि। हि। ते। सवना। मानुषेषु। भूरि। मनीषी। हवते। त्वाम्। इत्। मा। आरे। अस्मत्। मघऽवन्। ज्योक्। करिति कः ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 6 Mantra » 1

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Meaning
हे (मघवन्) बहुत विद्यारूपी ऐश्वर्य्ययुक्त ! जो (मानुषेषु) मनुष्यों में (भूरि) बहुत (मनीषी) बुद्धिवाला जन (ते) आपके (सवना) यज्ञसिद्धि करानेवाले कर्मों वा प्रेरणाओं को (भूरि) बहुत (हवते) ग्रहण करता तथा जो (त्वाम्) आप की (इत्) ही स्तुति प्रशंसा करता (हि) उसी को (अस्मत्) हम लोगों से (आरे) दूर (ज्योक्) निरन्तर (मा, कः) मत करो, किन्तु सदा हमारे समीप रक्खो ॥६॥
Essence
जो निश्चय से मनुष्यों के बीच उत्तम विद्वान् आप्त परीक्षा करनेवाला हो, उसको तथा अन्य अध्यापकों की निरन्तर प्रार्थना करो। आप लोगों को हमारे निकट जो धार्मिक, विद्वान् हो, यही निरन्तर रखने योग्य है, जो मिथ्या प्यारी वाणी बोलनेवाला न हो ॥६॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या इच्छा करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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