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Rigveda Mandal 7 / Sukta 22 / Mantra 1

104 Sukta
9 Mantra
7/22/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
पिबा॒ सोम॑मिन्द्र॒ मन्द॑तु त्वा॒ यं ते॑ सु॒षाव॑ हर्य॒श्वाद्रिः॑। सो॒तुर्बा॒हुभ्यां॒ सुय॑तो॒ नार्वा॑ ॥१॥

पिब॑ । सोम॑म् । इ॒न्द्र॒ । मन्द॑तु । त्वा॒ । यम् । ते॒ । सु॒साव॑ । ह॒रि॒ऽअ॒श्व॒ । अद्रिः॑ । सो॒तुः । बा॒हुऽभ्या॑म् । सुऽय॑तः । न । अर्वा॑ ॥

Mantra without Swara
पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा यं ते सुषाव हर्यश्वाद्रिः। सोतुर्बाहुभ्यां सुयतो नार्वा ॥

पिब। सोमम्। इन्द्र। मन्दतु। त्वा। यम्। ते। सुसाव। हरिऽअश्व। अद्रिः। सोतुः। बाहुऽभ्याम्। सुऽयतः। न। अर्वा ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 5 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (हर्यश्च) मनोहर घोड़ेवाले (इन्द्र) रोग नष्टकर्त्ता वैद्यजन ! आप (अर्वा) घोड़े के (न) समान (सोमम्) बड़ी ओषधियों के रस को (पिब) पीओ (यम्) जिसको (अद्रिः) मेघ (सुषाव) उत्पन्न करता है और जो (सोतुः) सार निकालने वा (सुयतः) सार निकालने की और सिद्धि करनेवाले (ते) आपकी (बाहुभ्याम्) बाहुओं से कार्य सिद्धि करता है वह (त्वा) आपको (मन्दतु) आनन्दित करे ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे वैद्यो ! तुम जैसे घोड़े तृण, अन्न और जलादिकों का अच्छे प्रकार सेवन कर पुष्ट होते हैं, वैसे ही बड़ी ओषधियों के रसों को पीकर बलवान् होओ ॥१॥
Subject
अब नव ऋचावाले बाईसवें सूक्त का प्रारम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य क्या करके कैसा हो, इस विषय को उपदेश करते हैं ॥