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Rigveda Mandal 7 / Sukta 21 / Mantra 6

104 Sukta
10 Mantra
7/21/6
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒भि क्रत्वे॑न्द्र भू॒रध॒ ज्मन्न ते॑ विव्यङ्महि॒मानं॒ रजां॑सि। स्वेना॒ हि वृ॒त्रं शव॑सा ज॒घन्थ॒ न शत्रु॒रन्तं॑ विविदद्यु॒धा ते॑ ॥६॥

अ॒भि । क्रत्वा॑ । इ॒न्द्र॒ । भूः॒ । अध॑ । ज्मन् । न । ते॒ । वि॒व्य॒क् । म॒हि॒मान॑म् । रजां॑सि । स्वेन॑ । हि । वृ॒त्रम् । शव॑सा । ज॒घन्थ॑ । न । शत्रुः॑ । अन्त॑म् । वि॒वि॒द॒त् । यु॒धा । ते॒ ॥

Mantra without Swara
अभि क्रत्वेन्द्र भूरध ज्मन्न ते विव्यङ्महिमानं रजांसि। स्वेना हि वृत्रं शवसा जघन्थ न शत्रुरन्तं विविदद्युधा ते ॥

अभि। क्रत्वा। इन्द्र। भूः। अध। ज्मन्। न। ते। विव्यक्। महिमानम्। रजांसि। स्वेन। हि। वृत्रम्। शवसा। जघन्थ। न। शत्रुः। अन्तम्। विविदत्। युधा। ते ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 4 Mantra » 1

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Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त जन ! आप (क्रत्वा) बुद्धि के साथ (ज्मन्) पृथिवी पर शत्रुओं के (अभि, भूः) सम्मुख हूजिये (अध) इसके अनन्तर (ते) आपके (महिमानम्) बड़प्पन को और (रजांसि) ऐश्वर्य्यों को (शत्रुः) शत्रुजन मुझे (न)(विव्यक्) व्याप्त हों (स्वेन) अपने (शवसा) बल से (हि) ही सूर्य जैसे (वृत्रम्) मेघ को, वैसे शत्रु को आप (जघन्थ) मारो इस प्रकार से (युधा) संग्राम से शत्रुजन (ते) आपके (अन्तम्) अन्त अर्थात् नाश वा सिद्धान्त को (न)(विविदत्) प्राप्त हो ॥६॥
Essence
जो मनुष्य शरीर और आत्मा के बल को प्रतिदिन बढ़ाते हैं, उन के शत्रुजन दूर से भागते हैं, किन्तु वह आप शत्रुओं को जीत सकें ॥६॥
Subject
अब कैसे जन से शत्रुजन नहीं जीत सकते, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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