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Rigveda Mandal 7 / Sukta 21 / Mantra 3

104 Sukta
10 Mantra
7/21/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वमि॑न्द्र॒ स्रवि॑त॒वा अ॒पस्कः॒ परि॑ष्ठिता॒ अहि॑ना शूर पू॒र्वीः। त्वद्वा॑वक्रे र॒थ्यो॒३॒॑ न धेना॒ रेज॑न्ते॒ विश्वा॑ कृ॒त्रिमा॑णि भी॒षा ॥३॥

त्वम् । इ॒न्द्र॒ । स्रवि॑त॒वै । अ॒पः । क॒रिति॑ कः । परि॑ऽस्थिताः । अहि॑ना । शू॒र॒ । पू॒र्वीः । त्वत् । वा॒व॒क्रे॒ । र॒थ्यः॑ । न । धेनाः॑ । रेज॑न्ते । विश्वा॑ । कृ॒त्रिमा॑णि । भी॒षा ॥

Mantra without Swara
त्वमिन्द्र स्रवितवा अपस्कः परिष्ठिता अहिना शूर पूर्वीः। त्वद्वावक्रे रथ्यो३ न धेना रेजन्ते विश्वा कृत्रिमाणि भीषा ॥

त्वम्। इन्द्र। स्रवितवै। अपः। करिति कः। परिऽस्थिताः। अहिना। शूर। पूर्वीः। त्वत्। वावक्रे। रथ्यः। न। धेनाः। रेजन्ते। विश्वा। कृत्रिमाणि। भीषा ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 3 Mantra » 3

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Meaning
हे (शूर) शूरवीर (इन्द्रः) सूर्य के समान विद्वान् राजा ! जैसे सूर्य्य (स्रवितवै) वर्षा को (अहिना) मेघ के साथ (पूर्वीः) पहिले स्थिर हुए (परिष्ठिताः) वा सब ओर से स्थिर होनेवाले (अपः) जलों को उत्पन्न करता है, वैसे (त्वम्) आप प्रजा जनों को सन्मार्ग में (कः) स्थिर करो जैसे सूर्य आदि और (रथ्यः) रथ के लिये हितकारी घोड़ा यह सब पदार्थ (वावक्रे) टेढ़े चलते हैं और (विश्वा) समस्त (वि, कृत्रिमणि) विशेषता से कृत्रिम किये कामों को (रेजन्ते) कंपित करते हैं, वैसे (त्वत्) तुम से (भीषा) उत्पन्न हुए भय से प्रजाजन (धेनाः) बोली हुई वाणियों के (न) समान प्रवृत्त हों ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो राजा सूर्य्य के समान प्रजाजनों की पालना करता है, दुष्टों को भय देता है, वही सुख से व्याप्त होता है ॥३॥
Subject
फिर वह राजा किसके तुल्य क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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