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Rigveda Mandal 7 / Sukta 21 / Mantra 10

104 Sukta
10 Mantra
7/21/10
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स न॑ इन्द्र॒ त्वय॑ताया इ॒षे धा॒स्त्मना॑ च॒ ये म॒घवा॑नो जु॒नन्ति॑। वस्वी॒ षु ते॑ जरि॒त्रे अ॑स्तु श॒क्तिर्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥१०॥

सः । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । त्वऽय॑तायै । इ॒षे । धाः॒ । त्मना॑ । च॒ । ये । म॒घऽवा॑नः । जु॒नन्ति॑ । वस्वी॑ । सु । ते॒ । ज॒रि॒त्रे । अ॒स्तु । श॒क्तिः । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
स न इन्द्र त्वयताया इषे धास्त्मना च ये मघवानो जुनन्ति। वस्वी षु ते जरित्रे अस्तु शक्तिर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

सः। नः। इन्द्र। त्वऽयतायै। इषे। धाः। त्मना। च। ये। मघऽवानः। जुनन्ति। वस्वी। सु। ते। जरित्रे। अस्तु। शक्तिः। यूयम्। पात। स्वस्तिऽभिः। सदा। नः ॥१०॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 4 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) दुःख के विदीर्ण करनेवाले ! (सः) सो आप (त्वयतायै) आपने जो बड़े यत्न से सिद्ध की उस (इषे) इच्छा सिद्धि वा अन्न की प्राप्ति के लिये (नः) हम लोगों को (धाः) धारण कीजिये (ये, च) और जो (मघवानः) नित्य धनाढ्य जन (जुनन्ति) प्रेरणा देते हैं उनको भी उक्त इच्छासिद्धि वा अन्न की प्राप्ति के लिये धारण कीजिये जिससे (ते) आपकी (जरित्रे) स्तुति करनेवाले के लिये (वस्वी) धन करनेवाली (शक्तिः) सामर्थ्य (अस्तु) हो। हे मन्त्री जनो ! (यूयम्) तुम लोग (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हम लोगों को (सदा) सब कभी =सदा (सु, पात) अच्छे प्रकार रक्षा करो ॥१०॥
Essence
हे राजा ! आप प्रयत्न से सबको पुरुषार्थी कर निरन्तर धनाढ्य कीजिये और अच्छे कामों में प्रेरणा दीजिये जिससे आपकी भृत्यों की अलौकिक शक्ति हो और ये आपकी सर्वदा रक्षा करें ॥१०॥ इस सूक्त में राजा, प्रजा, विद्वान्, इन्द्र, मित्र, सत्य, गुण और याच्ञा आदि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह इक्कीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर राजा-प्रजाजन परस्पर कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥