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Rigveda Mandal 7 / Sukta 21 / Mantra 1

104 Sukta
10 Mantra
7/21/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
असा॑वि दे॒वं गोऋ॑जीक॒मन्धो॒ न्य॑स्मि॒न्निन्द्रो॑ ज॒नुषे॑मुवोच। बोधा॑मसि त्वा हर्यश्व य॒ज्ञैर्बोधा॑ नः॒ स्तोम॒मन्ध॑सो॒ मदे॑षु ॥१॥

असा॑वि । दे॒वम् । गोऽऋ॑जीकम् । अन्धः॑ । नि । अ॒स्मि॒न् । इन्द्रः॑ । ज॒नुषा॑ । ई॒म् । उ॒वो॒च॒ । बोधा॑मसि । त्वा॒ । ह॒रि॒ऽअ॒श्व॒ । य॒ज्ञैः । बोध॑ । नः॒ । स्तोम॑म् । अन्ध॑सः । मदे॑षु ॥

Mantra without Swara
असावि देवं गोऋजीकमन्धो न्यस्मिन्निन्द्रो जनुषेमुवोच। बोधामसि त्वा हर्यश्व यज्ञैर्बोधा नः स्तोममन्धसो मदेषु ॥

असावि। देवम्। गोऽऋजीकम्। अन्धः। नि। अस्मिन्। इन्द्रः। जनुषा। ईम्। उवोच। बोधामसि। त्वा। हरिऽअश्व। यज्ञैः। बोध। नः। स्तोमम्। अन्धसः। मदेषु ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 3 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (हर्यश्व) मनोहर घोड़ोंवाले ! जो (अन्धः) अन्न (असावि) उत्पन्न होता उसकी तथा (जनुषा) जन्म से अर्थात् उत्पन्न होते समय से (ईम्) ही (गोऋजीकम्) भूमि के कोमलता से प्राप्त कराने और (देवम्) देनेवाले को (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्ययुक्त जन (उवोच) कहे वा जिसके निमित्त (त्वा) आप को (नि, बोधामसि) निरन्तर बोधित करें (अस्मिन्) इस व्यवहार में आप (अन्धसः) अन्न आदि पदार्थ के (मदेषु) आनन्दों में (यज्ञैः) विद्वानों के सङ्ग आदि से (नः) हम लोगों को (बोध) बोध देओ और (स्तोमम्) प्रशंसा की प्राप्ति कराओ ॥१॥
Essence
जो मनुष्य पृथिवी आदि से धान्य आदि को प्राप्त होकर विद्या को प्राप्त होते हैं और जो विद्वानों के सङ्ग से समस्त विद्या के रहस्यों को ग्रहण करते हैं, वे कभी दुःखी नहीं होते हैं ॥१॥
Subject
अब दश ऋचावाले इक्कीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥