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Rigveda Mandal 7 / Sukta 20 / Mantra 5

104 Sukta
10 Mantra
7/20/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वृषा॑ जजान॒ वृष॑णं॒ रणा॑य॒ तमु॑ चि॒न्नारी॒ नर्यं॑ सुसूव। प्र यः से॑ना॒नीरध॒ नृभ्यो॒ अस्ती॒नः सत्वा॑ ग॒वेष॑णः॒ स धृ॒ष्णुः ॥५॥

वृषा॑ । ज॒जा॒न॒ । वृष॑णम् । रणा॑य । तम् । ऊँ॒ इति॑ । चि॒त् । नारी॑ । नर्य॑म् । स॒सू॒व॒ । प्र । यः । से॒ना॒ऽनीः । अध॑ । नृऽभ्यः॑ । अस्ति॑ । इ॒नः । सत्वा॑ । गो॒ऽएष॑णः । सः । धृ॒ष्णुः ॥

Mantra without Swara
वृषा जजान वृषणं रणाय तमु चिन्नारी नर्यं सुसूव। प्र यः सेनानीरध नृभ्यो अस्तीनः सत्वा गवेषणः स धृष्णुः ॥

वृषा। जजान। वृषणम्। रणाय। तम्। ऊँ इति। चित्। नारी। नर्यम्। सुसूव। प्र। यः। सेनाऽनीः। अध। नृऽभ्यः। अस्ति। इनः। सत्वा। गोऽएषणः। सः। धृष्णुः ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 1 Mantra » 5

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Meaning
(यः) जो (वृषा) वर्षा करने (सेनानीः) सेना को पहुँचाने (सत्वा) बलवान् (गवेषणः) और उत्तम वाणी विद्या का ढूँढनेवाला (नृभ्यः) सेना नायकों से (धृष्णुः) धृष्ट प्रगल्भ (जजान) उत्पन्न हो (सः) वह (इनः) ईश्वर के समान (रणाय) संग्राम के लिये प्रतापी (अस्ति) है (अध) इसके अनन्तर जिस (उ) ही (नर्यम्) मनुष्यों में (वृषणम्) बलिष्ठ योद्धा पुत्र को वर्षा करनेवाला पुरुष और (नारी) स्त्री (प्र, सुसूव) उत्पन्न करते हैं (तम्, चित्) उसी को जन न्यायकारी मानते हैं ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जिसको स्त्रीपुरुष दीर्घ ब्रह्मचर्य्य का सेवन कर उत्पन्न करते हैं, वह पुरुष जगदीश्वरवत् सब को न्याय से पालने को समर्थ होकर सेनाधिप हुआ शत्रुओं के जीतने को सदा समर्थ होता है ॥५॥
Subject
उत्पन्न हुआ मनुष्य कैसा होकर सामर्थ्यवान् होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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