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Rigveda Mandal 7 / Sukta 20 / Mantra 3

104 Sukta
10 Mantra
7/20/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒ध्मो अ॑न॒र्वा ख॑ज॒कृत्स॒मद्वा॒ शूरः॑ सत्रा॒षाड्ज॒नुषे॒मषा॑ळ्हः। व्या॑स॒ इन्द्रः॒ पृत॑नाः॒ स्वोजा॒ अधा॒ विश्वं॑ शत्रू॒यन्तं॑ जघान ॥३॥

यु॒ध्मः । अ॒न॒र्वा । ख॒ज॒ऽकृत् । स॒मत्ऽवा॑ । शूरः॑ । स॒त्रा॒षाट् । ज॒नुषा॑ । ई॒म् । अषा॑ळ्हः । वि । आ॒से॒ । इन्द्रः॑ । पृत॑नाः । सु॒ऽओजाः॑ । अध॑ । विश्व॑म् । श॒त्रु॒ऽयन्त॑म् । ज॒घा॒न॒ ॥

Mantra without Swara
युध्मो अनर्वा खजकृत्समद्वा शूरः सत्राषाड्जनुषेमषाळ्हः। व्यास इन्द्रः पृतनाः स्वोजा अधा विश्वं शत्रूयन्तं जघान ॥

युध्मः। अनर्वा। खजऽकृत्। समत्ऽवा। शूरः। सत्राषाट्। जनुषा। ईम्। अषाळ्हः। वि। आसे। इन्द्रः। पृतनाः। सुऽओजाः। अध। विश्वम्। शत्रुऽयन्तम्। जघान ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 1 Mantra » 3

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Meaning
जो राजा (इन्द्रः) बिजुली के समान (जनुषा) जन्म से (स्वोजाः) शुभ अन्न वा पराक्रम जिसके विद्यमान (युध्मः) जो युद्ध करनेवाला (अनर्वा) जिसके घोड़े विद्यमान नहीं जो (अषाळ्हः) शत्रुओं से न सहने योग्य (खजकृत्) सङ्ग्राम करनेवाला (समद्वा) जो मत्त प्रमत्त मनुष्यों को सेवता (शूरः) शत्रुओं को मारता (सत्राषाट्) जो यज्ञों के करने को सहता और (पृतनाः) अपनी सेनाओं को पाले (अध) इसके अनन्तर (वि, आसे) विशेषता से मुख के सम्मुख (विश्वम्) सब (शत्रूयन्तम्) शत्रुओं की कामना करनेवाले को (ईम्) सब ओर से (जघान) मारे वही शत्रुओं को जीत सके ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! श्रेष्ठ राजगुणों सहित, दीर्घ ब्रह्मचर्य्य से द्वितीय जन्म अर्थात् विद्या जन्म का कर्त्ता, पूर्ण बल पराक्रमयुक्त, धार्मिक हो वह सूर्य के समान दुष्ट शत्रुओं को अन्यायरूपी अन्धकार को निवारे, वही सब का आनन्द देनेवाला हो ॥३॥
Subject
फिर वह कैसा होकर क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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