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Rigveda Mandal 7 / Sukta 20 / Mantra 2

104 Sukta
10 Mantra
7/20/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हन्ता॑ वृ॒त्रमिन्द्रः॒ शूशु॑वानः॒ प्रावी॒न्नु वी॒रो ज॑रि॒तार॑मू॒ती। कर्ता॑ सु॒दासे॒ अह॒ वा उ॑ लो॒कं दाता॒ वसु॒ मुहु॒रा दा॒शुषे॑ भूत् ॥२॥

हन्ता॑ । वृ॒त्रम् । इन्द्रः॑ । शूशु॑वानः । प्र । आ॒वी॒त् । नु । वी॒रः । ज॒रि॒तार॑म् । ऊ॒ती । कर्ता॑ । सु॒ऽदासे॑ । अह॑ । वै । ऊँ॒ इति॑ । लो॒कम् । दाता॑ । वसु॑ । मुहुः॑ । आ । दा॒शुषे॑ । भू॒त् ॥

Mantra without Swara
हन्ता वृत्रमिन्द्रः शूशुवानः प्रावीन्नु वीरो जरितारमूती। कर्ता सुदासे अह वा उ लोकं दाता वसु मुहुरा दाशुषे भूत् ॥

हन्ता। वृत्रम्। इन्द्रः। शूशुवानः। प्र। आवीत्। नु। वीरः। जरितारम्। ऊती। कर्ता। सुऽदासे। अह। वै। ऊँ इति। लोकम्। दाता। वसु। मुहुः। आ। दाशुषे। भूत् ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 1 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! (इन्द्रः) सूर्य जैसे (वृत्रम्) मेघ को, वैसे जो शत्रुओं का (अह) निग्रह कर अर्थात् पकड़-पकड़ (नु) शीघ्र (हन्ता) घात करनेवाला राजा (शूशुवानः) निरन्तर बढ़ते हुए (वीरः) शुभ गुण-कर्म-स्वभावों में व्याप्त (कर्त्ता) दृढ़ कार्य करनेवाले और (वसु, दाता) धन के देनेवाले (सुदासे) सुन्दर दानशील के लिये ही (ऊती) रक्षा से (जरितारम्) गुणों की प्रशंसा करनेवाले (उ) अद्भुत (लोकम्) अन्य जन्म में देखने योग्य वा अन्य लोक को (मुहुः) वार-वार (प्र, आवीत्) उत्तम रक्षा करे (दाशुषे) दानशील के लिये वार-वार (आ, भूत्) प्रसिद्ध हो (वै) वही राज्य करने के लिये श्रेष्ठ हो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो शीघ्रकारी, सूर्य के समान विद्या और विनय के प्रकाश से दुष्टों का निवारण करनेवाला शूरवीर होता हुआ अच्छे सुपात्रों के लिये यथायोग्य पदार्थ देता हुआ बहुत सुख को प्राप्त हो ॥२॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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