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Rigveda Mandal 7 / Sukta 20 / Mantra 1

104 Sukta
10 Mantra
7/20/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒ग्रो ज॑ज्ञे वी॒र्या॑य स्व॒धावा॒ञ्चक्रि॒रपो॒ नर्यो॒ यत्क॑रि॒ष्यन्। जग्मि॒र्युवा॑ नृ॒षद॑न॒मवो॑भिस्त्रा॒ता न॒ इन्द्र॒ एन॑सो म॒हश्चि॑त् ॥१॥

उ॒ग्रः । ज॒ज्ञे॒ । वी॒र्या॑य । स्व॒धाऽवा॑न् । चक्रिः॑ । अपः॑ । नर्यः॑ । यत् । क॒रि॒ष्यन् । जग्मिः॑ । युवा॑ । नृ॒ऽसद॑नम् । अवः॑ऽभिः । त्रा॒ता । नः॒ । इन्द्रः॑ । एन॑सः । म॒हः । चि॒त् ॥

Mantra without Swara
उग्रो जज्ञे वीर्याय स्वधावाञ्चक्रिरपो नर्यो यत्करिष्यन्। जग्मिर्युवा नृषदनमवोभिस्त्राता न इन्द्र एनसो महश्चित् ॥

उग्रः। जज्ञे। वीर्याय। स्वधाऽवान्। चक्रिः। अपः। नर्यः। यत्। करिष्यन्। जग्मिः। युवा। नृऽसदनम्। अवःऽभिः। त्राता। नः। इन्द्रः। एनसः। महः। चित् ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 1 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो (नर्यः) मनुष्यों में साधु उत्तम जन (स्वधावान्) बहुत धनधान्य से युक्त (चक्रिः) करनेवाला (उग्रः) तेजस्वी (युवा) जवान मनुष्य (नृषदनम्) मनुष्यों के स्थान को (जग्मिः) जानेवाला (अवोभिः) रक्षा आदि से पालना (करिष्यन्) करता हुआ (त्राता) रक्षा करनेवाला सूर्य जैसे (अपः) जलों को (चित्) वैसे (इन्द्रः) राजा (वीर्याय) पराक्रम के लिये (जज्ञे) उत्पन्न हो और (महः) महान् (एनसः) पापाचरण से (नः) हम लोगों को अलग रखता है, वही राजा होने के योग्य है ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो मनुष्यों का हितकारी पिता के समान पालने और उपदेश करनेवाले के समान पापाचरण से अलग रखनेवाला, सभा में स्थित होकर न्यायकर्ता तथा धन, ऐश्वर्य और पराक्रम को निरन्तर बढ़ाता है, उसी को सब मनुष्य राजा मानें ॥१॥
Subject
अब पञ्चमाष्टक के तीसरे अध्याय तथा दश ऋचावाले बीसवें सूक्त का आरम्भ है, जिसके पहले मन्त्र में कैसा राजा श्रेष्ठ हो, इस विषय को कहते हैं ॥