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Rigveda Mandal 7 / Sukta 2 / Mantra 9

104 Sukta
11 Mantra
7/2/9
Devata- आप्रियः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तन्न॑स्तु॒रीप॒मध॑ पोषयि॒त्नु देव॑ त्वष्ट॒र्वि र॑रा॒णः स्य॑स्व। यतो॑ वी॒रः क॑र्म॒ण्यः॑ सु॒दक्षो॑ यु॒क्तग्रा॑वा॒ जाय॑ते दे॒वका॑मः ॥९॥

तत् । नः॒ । तु॒रीप॑म् । अध॑ । पो॒ष॒यि॒त्नु । देव॑ । त्व॒ष्टः॒ । वि । र॒रा॒णः । स्य॒स्वेति॑ स्यस्व । यतः॑ । वी॒रः । क॒र्म॒ण्यः॑ । सु॒ऽदक्षः॑ । यु॒क्तऽग्रा॑वा । जाय॑ते । दे॒वऽका॑मः ॥

Mantra without Swara
तन्नस्तुरीपमध पोषयित्नु देव त्वष्टर्वि रराणः स्यस्व। यतो वीरः कर्मण्यः सुदक्षो युक्तग्रावा जायते देवकामः ॥

तत्। नः। तुरीपम्। अध। पोषयित्नु। देव। त्वष्टः। वि। रराणः। स्यस्वेति स्यस्व। यतः। वीरः। कर्मण्यः। सुऽदक्षः। युक्तऽग्रावा। जायते। देवऽकामः ॥९॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 2 Mantra » 4

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Meaning
हे (त्वष्टः) विद्या को प्राप्त करानेवाले (देव) विद्वान् ! (वि, रराणः) विशेष विद्या देते हुए (नः) हमारे (तत्) पढ़ाने के आसन को (पोषयित्नु) पुष्ट करनेवाले (तुरीपम्) शीघ्र (स्यस्व) विद्या को पार कीजिये (अध) अब (यतः) जिससे (कर्मण्यः) कर्मों में कुशल (सुदक्षः) सुन्दर बल से युक्त (युक्तग्रावा) मेघ को युक्त करने और (देवकामः) विद्वानों की कामना करनेवाला (वीरः) वीर पुरुष (जायते) प्रकट होता है ॥९॥
Essence
सब मनुष्यों को उचित है कि सब लाभों से विद्यालाभ को उत्तम मान के उसको प्राप्त हों, सदैव जो विद्वानों का सङ्ग करके सदा कर्मों का अनुष्ठान करनेवाला होता है, वह श्रेष्ठ आत्मा के बलवाला होता है ॥९॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या प्राप्त करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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