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Rigveda Mandal 7 / Sukta 2 / Mantra 5

104 Sukta
11 Mantra
7/2/5
Devata- आप्रियः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स्वा॒ध्यो॒३॒॑ वि दुरो॑ देव॒यन्तोऽशि॑श्रयू रथ॒युर्दे॒वता॑ता। पू॒र्वी शिशुं॒ न मा॒तरा॑ रिहा॒णे सम॒ग्रुवो॒ न सम॑नेष्वञ्जन् ॥५॥

सु॒ऽआ॒ध्यः॑ । वि । दुरः॑ । दे॒व॒ऽयन्तः॑ । अशि॑श्रयुः । र॒थ॒ऽयुः । दे॒वऽता॑ता । पू॒र्वी इति॑ । शिशु॑म् । न । मा॒तरा॑ । रि॒हा॒णे इति॑ । सम् । अ॒ग्रुवः॑ । न । सम॑नेषु । अ॒ञ्ज॒न् ॥

Mantra without Swara
स्वाध्यो३ वि दुरो देवयन्तोऽशिश्रयू रथयुर्देवताता। पूर्वी शिशुं न मातरा रिहाणे समग्रुवो न समनेष्वञ्जन् ॥

सुऽआध्यः। वि। दुरः। देवऽयन्तः। अशिश्रयुः। रथऽयुः। देवऽताता। पूर्वी इति। शिशुम्। न। मातरा। रिहाणे इति। सम्। अग्रुवः। न। समनेषु। अञ्जन् ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 1 Mantra » 5

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Meaning
जो (स्वाध्यः) सुन्दर विचार करते (देवयन्तः) विद्वानों को चाहते हुए जन (देवताता) विद्वानों के अनुष्ठान या सङ्ग करने योग्य व्यवहार में (रथयुः) रथ को चाहनेवाले के तुल्य (रिहाणे) स्वाद लेते हुए (पूर्वी) अपने से पूर्व हुए (मातरा) माता-पिता (शिशुम्, न) बालक के तुल्य (समनेषु) संग्रामों में (अग्रुवः) आगे चलती हुई सेनाएँ (न) जैसे, वैसे (दुरः) द्वारों का (वि, अशिश्रयुः) विशेष आश्रय करते हैं और (सम्, अञ्जन्) चलते हैं, वे सुख करनेवाले होवें ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सम्यक् विचार करते हुए, विद्वानों के सङ्ग में प्रीति रखनेवाले यज्ञ के तुल्य परोपकारी, माता-पिता के तुल्य सब की उन्नति करते और संग्रामों को जीतते हुए, न्याय से प्रजाओं का पालन करते हैं, वे सदा सुखी होते हैं ॥५॥
Subject
फिर विद्वान् लोग कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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