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Rigveda Mandal 7 / Sukta 2 / Mantra 4

104 Sukta
11 Mantra
7/2/4
Devata- आप्रियः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒प॒र्यवो॒ भर॑माणा अभि॒ज्ञु प्र वृ॑ञ्जते॒ नम॑सा ब॒र्हिर॒ग्नौ। आ॒जुह्वा॑ना घृ॒तपृ॑ष्ठं॒ पृष॑द्व॒दध्व॑र्यवो ह॒विषा॑ मर्जयध्वम् ॥४॥

स॒प॒र्यवः॑ । भर॑माणाः । अ॒भि॒ऽज्ञु । प्र । वृ॒ञ्ज॒ते॒ । नम॑सा । ब॒र्हिः । अ॒ग्नौ । आ॒ऽजुह्वा॑नाः । घृ॒तऽपृ॑ष्ठम् । पृष॑त्ऽवत् । अध्व॑र्यवः । ह॒विषा॑ । म॒र्ज॒य॒ध्व॒म् ॥

Mantra without Swara
सपर्यवो भरमाणा अभिज्ञु प्र वृञ्जते नमसा बर्हिरग्नौ। आजुह्वाना घृतपृष्ठं पृषद्वदध्वर्यवो हविषा मर्जयध्वम् ॥

सपर्यवः। भरमाणाः। अभिऽज्ञु। प्र। वृञ्जते। नमसा। बर्हिः। अग्नौ। आऽजुह्वानाः। घृतऽपृष्ठम्। पृषत्ऽवत्। अध्वर्यवः। हविषा। मर्जयध्वम् ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 1 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (अभिज्ञु) विद्वानों के समीप पग पीछे करके सन्मुख घोटूँ जिन के हों, वे विद्यार्थी विद्वान् होकर (सपर्यवः) सत्य का सेवन करते और (भरमाणाः) विद्या को धारण करते हुए (नमसा) अन्न के साथ (बर्हिः) उत्तम घृत आदि को (अग्नौ) अग्नि में (प्र, वृञ्जते) छोड़ते हैं, वैसे (घृतपृष्ठम्) घृत जिसके पीठ के तुल्य है, उस अग्नि को (आजुह्वानाः) अच्छे प्रकार होमयुक्त करते हुए (पृषद्वत्) सेवनकर्त्ता के तुल्य (अध्वर्यवः) अहिंसाधर्म चाहते हुए (हविषा) होम सामग्री से मनुष्यों के अन्तःकरणों को तुम लोग (मर्जयध्वम्) शुद्ध करो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् लोग यजमानों के तुल्य मनुष्यों के अन्तःकरण और आत्माओं को अध्यापन और उपदेश से शुद्ध करते हैं, वे आप शुद्ध होकर सब के उपकारक होते हैं ॥४॥
Subject
फिर मनुष्य कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥