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Rigveda Mandal 7 / Sukta 2 / Mantra 3

104 Sukta
11 Mantra
7/2/3
Devata- आप्रियः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ई॒ळेन्यं॑ वो॒ असु॑रं सु॒दक्ष॑म॒न्तर्दू॒तं रोद॑सी सत्य॒वाच॑म्। म॒नु॒ष्वद॒ग्निं मनु॑ना॒ समि॑द्धं॒ सम॑ध्व॒राय॒ सद॒मिन्म॑हेम ॥३॥

ई॒ळेन्य॑म् । वः॒ । असु॑रम् । सु॒ऽदक्ष॑म् । अ॒न्तः । दू॒तम् । रोद॑सी॒ इति॑ । स॒त्य॒ऽवाच॑म् । म॒नु॒ष्वत् । अ॒ग्निम् । मनु॑ना । सम्ऽइ॑द्धम् । सम् । अ॒ध्व॒राय॑ । सद॑म् । इत् । म॒हे॒म॒ ॥

Mantra without Swara
ईळेन्यं वो असुरं सुदक्षमन्तर्दूतं रोदसी सत्यवाचम्। मनुष्वदग्निं मनुना समिद्धं समध्वराय सदमिन्महेम ॥

ईळेन्यम्। वः। असुरम्। सुऽदक्षम्। अन्तः। दूतम्। रोदसी इति। सत्यऽवाचम्। मनुष्वत्। अग्निम्। मनुना। सम्ऽइद्धम्। सम्। अध्वराय। सदम्। इत्। महेम ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 1 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वानो ! जैसे हम लोग (वः) आपके (अन्तः) बीच में (असुरम्) मेघ के तुल्य वर्त्तमान (सुदक्षम्) सुन्दर बल और चतुराई से युक्त (रोदसी) सूर्य-भूमि और (दूतम्) उपताप देनेवाले (अग्निम्) कार्य को सिद्ध करनेवाले अग्नि को जैसे, वैसे (सत्यवाचम्) सत्य बोलनेवाले (ईळेन्यम्) प्रशंसा योग्य (मनुष्वत्) मनुष्य के तुल्य (मनुना) मननशील विद्वान् के साथ (अध्वराय) हिंसारहित व्यवहार के लिये (समिद्धम्) प्रदीप्त किये (सदम्) जिसके निकट बैठें, उस अग्नि के तुल्य विद्वान् को (सम्, इत्, महेम) सम्यक् ही सत्कार करें, वैसे तुम लोग भी इस का सत्कार करो ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो मेघ के तुल्य उपकारक, अग्नि के तुल्य प्रकाशित विद्यावाले, धर्मात्मा, विद्वानों का सत्कार करते हैं, वे सर्वत्र सत्कार पाते हैं ॥३॥
Subject
फिर मनुष्य किसका सत्कार करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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