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Rigveda Mandal 7 / Sukta 19 / Mantra 8

104 Sukta
11 Mantra
7/19/8
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्रि॒यास॒ इत्ते॑ मघवन्न॒भिष्टौ॒ नरो॑ मदेम शर॒णे सखा॑यः। नि तु॒र्वशं॒ नि याद्वं॑ शिशीह्यतिथि॒ग्वाय॒ शंस्यं॑ करि॒ष्यन् ॥८॥

प्रि॒यासः॑ । इत् । ते॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । अ॒भिष्टौ॑ । नरः॑ । म॒दे॒म॒ । श॒र॒णे । सखा॑यः । नि । तु॒र्वश॑म् । नि । याद्व॑म् । शि॒शी॒हि॒ । अ॒ति॒थि॒ऽग्वाय॑ । शंस्य॑म् । क॒रि॒ष्यन् ॥

Mantra without Swara
प्रियास इत्ते मघवन्नभिष्टौ नरो मदेम शरणे सखायः। नि तुर्वशं नि याद्वं शिशीह्यतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन् ॥

प्रियासः। इत्। ते। मघऽवन्। अभिष्टौ। नरः। मदेम। शरणे। सखायः। नि। तुर्वशम्। नि। याद्वम्। शिशीहि। अतिथिऽग्वाय। शंस्यम्। करिष्यन् ॥८॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 30 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(मघवन्) बहुत धन देनेवाले ! (सखायः) मित्र होते हुए (प्रियासः) प्रीतिमान् वा प्रसन्न हुए (नरः) नायक मनुष्य हम लोग (ते) आपके (अभिष्टौ) सब ओर से प्रिय सङ्गति अर्थात् मेल मिलाप में (शरणे) शरणागत की पालना करने कर्म में (मदेम) आनन्दित हों। आप (तुर्वशम्) निकटस्थ मनुष्य को (नि, शिशीहि) निरन्तर तीक्ष्ण कीजिये और (याद्वम्) जो जाते हैं उन पर जो जाता है उसको (नि) निरन्तर तीक्ष्ण कीजिये और (अतिथिग्वाय) अतिथियों के गमन के लिये (शंस्यम्) प्रशंसनीय को (इत्) ही (करिष्यन्) करते हुए तीक्ष्ण कीजिये ॥८॥
Essence
हे राजन् ! जो शुभ गुणों के आचरण से युक्त तुम में प्रीतिमान् हों, उन धार्मिक जनों को प्रशंसित कीजिये, जैसे अतिथियों का आगमन हो, वैसा विधान कीजिये ॥८॥
Subject
फिर मनुष्य परस्पर कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥