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Rigveda Mandal 7 / Sukta 19 / Mantra 5

104 Sukta
11 Mantra
7/19/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तव॑ च्यौ॒त्नानि॑ वज्रहस्त॒ तानि॒ नव॒ यत्पुरो॑ नव॒तिं च॑ स॒द्यः। नि॒वेश॑ने शतत॒मावि॑वेषी॒रह॑ञ्च वृ॒त्रं नमु॑चिमु॒ताह॑न् ॥५॥

तव॑ । च्यौ॒त्नानि॑ । व॒ज्र॒ऽह॒स्त॒ । तानि॑ । नव॑ । यत् । पुरः॑ । न॒व॒तिम् । च॒ । स॒द्यः । नि॒ऽवेश॑ने । श॒त॒ऽत॒मा । अ॒वि॒वे॒षीः॒ । अह॑न् । च॒ । वृ॒त्रम् । नमु॑चिम् । उ॒त । अ॒ह॒न् ॥

Mantra without Swara
तव च्यौत्नानि वज्रहस्त तानि नव यत्पुरो नवतिं च सद्यः। निवेशने शततमाविवेषीरहञ्च वृत्रं नमुचिमुताहन् ॥

तव। च्यौत्नानि। वज्रऽहस्त। तानि। नव। यत्। पुरः। नवतिम्। च। सद्यः। निऽवेशने। शतऽतमा। अविवेषीः। अहन्। च। वृत्रम्। नमुचिम्। उत। अहन् ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 29 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वज्रहस्त) हाथ में वज्र रखनेवाले ! जैसे (तव) आपके (तानि) वे (च्यौत्नानि) बल हैं अर्थात् सूर्य (यत्) जो (नवनवतिम्) निन्यानवे (पुरः) मेघरूपी शत्रुओं की नगरी उनको (सद्यः) शीघ्र (अहन्) हनता (च) और (निवेशने) जिसमें निवास करते हैं उस स्थान में (शततमा) अतीव सैकड़ों को (उत) और (नमुचिम्) जो अपने रूप को नहीं छोड़ता उस (वृत्रम्) आच्छादन करनेवाले मेघ को (च) भी (अहन्) मारता, वैसे आप (अविवेषीः) व्याप्त हूजिये अर्थात् सेना जनों को प्राप्त होकर शत्रुबलों को प्राप्त हूजिये ॥५॥
Essence
हे राजन् ! जैसे सूर्य असंख्य मेघ की नगरियों के समान सघन घन घटाघूम बादलों को हनता है, वैसे तुम्हारे सेना जन उत्तम होकर समस्त शत्रुओं को मारें ॥५॥
Subject
फिर राजा के सेनाजन कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥