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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 9

104 Sukta
25 Mantra
7/18/9
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ई॒युरर्थं॒ न न्य॒र्थं परु॑ष्णीमा॒शुश्च॒नेद॑भिपि॒त्वं ज॑गाम। सु॒दास॒ इन्द्रः॑ सु॒तुकाँ॑ अ॒मित्रा॒नर॑न्धय॒न्मानु॑षे॒ वध्रि॑वाचः ॥९॥

ई॒युः । अर्थ॑म् । न । नि॒ऽअ॒र्थम् । परु॑ष्णीम् । आ॒शुः । च॒न । इत् । आ॒भि॒ऽपि॒त्वम् । ज॒गा॒म॒ । सु॒ऽदासे॑ । इन्द्रः॑ । सु॒ऽतुका॑न् । अ॒मित्रा॑न् । अर॑न्धयत् । मानु॑षे । वध्रि॑ऽवाचः ॥

Mantra without Swara
ईयुरर्थं न न्यर्थं परुष्णीमाशुश्चनेदभिपित्वं जगाम। सुदास इन्द्रः सुतुकाँ अमित्रानरन्धयन्मानुषे वध्रिवाचः ॥

ईयुः। अर्थम्। न। निऽअर्थम्। परुष्णीम्। आशुः। चन। इत्। आभिऽपित्वम्। जगाम। सुऽदासे। इन्द्रः। सुऽतुकान्। अमित्रान्। अरन्धयत्। मानुषे। वध्रिऽवाचः ॥९॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (सुदासः) सुन्दर दान जिसके विद्यमान वह (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् (अर्थम्) द्रव्य के (न) समान (न्यर्थम्) निश्चित अर्थवाले को (आशुः) शीघ्रकारी होता हुआ (परुष्णीम्) पालना करनेवाली नीति को (चन) भी (अभिपित्वम्) और प्राप्त होने योग्य पदार्थ को (जगाम) प्राप्त होता है (अमित्रान्) मित्रता रहित अर्थात् शत्रुओं को (अरन्धयत्) नष्ट करे और (मानुषे) मनुष्यों के इस संग्राम में (वध्रिवाचः) जिनकी वृद्धि देनेवाली वाणी वे (सुतुकान्) सुन्दर जिनके सन्तान है उनकी रक्षा करते हैं और भी मनुष्य (इत्) उसको (ईयुः) प्राप्त हों ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे राजजनो ! जैसे न्यायाधीश राजा न्याय से प्राप्त पदार्थ को लेता और अन्याय से उत्पन्न हुए पदार्थ को छोड़ता तथा श्रेष्ठों की सम्यक् रक्षा कर दुष्टों को दण्ड देता है, वही उत्तम होता है ॥९॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥