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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 8

104 Sukta
25 Mantra
7/18/8
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दु॒रा॒ध्यो॒३॒॑ अदि॑तिं स्रे॒वय॑न्तोऽचे॒तसो॒ वि ज॑गृभ्रे॒ परु॑ष्णीम्। म॒ह्नावि॑व्यक्पृथि॒वीं पत्य॑मानः प॒शुष्क॒विर॑शय॒च्चाय॑मानः ॥८॥

दु॒रो॒ध्यः॑ । अदि॑तिम् । स्रे॒वय॑न्तः । अ॒चे॒तसः॑ । वि । ज॒गृ॒भ्रे॒ । परू॑ष्णीम् । म॒ह्ना । अ॒वि॒व्य॒क् । पृ॒थि॒वीम् । पत्य॑मानः । प॒शुः । क॒विः । अ॒श॒य॒त् । चाय॑मानः ॥

Mantra without Swara
दुराध्यो३ अदितिं स्रेवयन्तोऽचेतसो वि जगृभ्रे परुष्णीम्। मह्नाविव्यक्पृथिवीं पत्यमानः पशुष्कविरशयच्चायमानः ॥

दुःऽआध्यः। अदितिम्। स्रेवयन्तः। अचेतसः। वि। जगृभ्रे। परुष्णीम्। मह्ना। अविव्यक्। पृथिवीम्। पत्यमानः। पशुः। कविः। अशयत्। चायमानः ॥८॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 3

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Meaning
जैसे (मह्ना) बड़प्पन से (पत्यमानः) पति के समान आचरण करता (चायमानः) वृद्धि को प्राप्त होता हुआ (कविः) प्रत्येक काम में आक्रमण करनेवाली बुद्धि जिसकी वह (पशुः) गो आदि पशु (अशयत्) सोता है (परुष्णीम्) पालनेवाली (पृथिवीम्) भूमि को (अविव्यक्) विविध प्रकार से आक्रमण करता है, वैसे जो (अचेतसः) निर्बुद्धि (दुराध्यः) दुष्टबुद्धिपुरुष (अदितिम्) उत्पत्ति काम को (स्रेवयन्तः) सेवते हुए (वि, जगृभ्रे) विशेषता से लेते हैं, वे वर्त्तमान हैं, ऐसा जानो ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! वे ही इस संसार में पशु के तुल्य पामरजन हैं, जो स्त्री में आसक्त हैं ॥८॥
Subject
कौन इस लोग में भाग्यहीन होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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