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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 6

104 Sukta
25 Mantra
7/18/6
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पु॒रो॒ळा इत्तु॒र्वशो॒ यक्षु॑रासीद्रा॒ये मत्स्या॑सो॒ निशि॑ता॒ अपी॑व। श्रु॒ष्टिं च॑क्रु॒र्भृग॑वो द्रु॒ह्यव॑श्च॒ सखा॒ सखा॑यमतर॒द्विषू॑चोः ॥६॥

पु॒रो॒ळाः । इत् । तु॒र्वशः॑ । यक्षुः॑ । आ॒सी॒त् । रा॒ये । मत्स्या॑सः । निऽशि॑ताः । अपि॑ऽइव । श्रु॒ष्टिम् । च॒क्रुः॒ । भृग॑वः । द्रु॒ह्यवः॑ । च॒ । सखा॑ । सखा॑यम् । अ॒त॒र॒त् । विषू॑चोः ॥

Mantra without Swara
पुरोळा इत्तुर्वशो यक्षुरासीद्राये मत्स्यासो निशिता अपीव। श्रुष्टिं चक्रुर्भृगवो द्रुह्यवश्च सखा सखायमतरद्विषूचोः ॥

पुरोळाः। इत्। तुर्वशः। यक्षुः। आसीत्। राये। मत्स्यासः। निऽशिताः। अपिऽइव। श्रुष्टिम्। चक्रुः। भृगवः। द्रुह्यवः। च। सखा। सखायम्। अतरत्। विषूचोः ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (राये) धन के लिये (तुर्वशः) शीघ्र वश करने और (पुरोळाः) आगे जाने (यक्षुः) दूसरों से मिलनेवाला (इत्) ही (आसीत्) है वा (च) और जो (मत्स्यासः) समुद्रों में स्थिर मछलियों के समान (अपीव) अतीव (निशिताः) निरन्तर तीक्ष्णस्वभायुक्त (भृगवः) परिपक्व ज्ञानवाले (द्रुह्यवः) दुष्टों की निन्दा करनेवाले (च) भी (श्रुष्टिम्) शीघ्रता (चक्रुः) करते हैं जो (सखा) मित्र (विषूचोः) विद्या और धर्म का सुन्दर शील जिनमें विद्यमान उन के (सखायम्) मित्र को (अतरत्) तरता है, उन सबों का आप सदा सत्कार करो ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे राजन् ! जो सब शुभ कर्म्मों में आगे, अच्छे प्रकार सिद्धि की उन्नति करनेवाले, बड़े मगरमच्छों के समान गम्भीर आशयवाले, शीघ्रकारी एक दूसरे में मित्रता रखनेवाले हों, उन अतीव बुद्धिमानों का सत्कार कर राज्यकार्य्यों में नियुक्त करो ॥६॥
Subject
फिर राजा किनका सत्कार करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥