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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 4

104 Sukta
25 Mantra
7/18/4
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
धे॒नुं न त्वा॑ सू॒यव॑से॒ दुदु॑क्ष॒न्नुप॒ ब्रह्मा॑णि ससृजे॒ वसि॑ष्ठः। त्वामिन्मे॒ गोप॑तिं॒ विश्व॑ आ॒हा न॒ इन्द्रः॑ सुम॒तिं ग॒न्त्वच्छ॑ ॥४॥

धे॒नुम् । न । त्वा॒ । सु॒ऽयव॑से । दुधु॑क्षन् । उप॑ । ब्रह्मा॑णि । स॒सृ॒जे॒ । वसि॑ष्ठः । त्वाम् । इत् । मे॒ । गोऽप॑तिम् । विश्वः॑ । आ॒ह॒ । आ । नः॒ । इन्द्रः॑ । सु॒ऽम॒तिम् । ग॒न्तु॒ । अच्छ॑ ॥

Mantra without Swara
धेनुं न त्वा सूयवसे दुदुक्षन्नुप ब्रह्माणि ससृजे वसिष्ठः। त्वामिन्मे गोपतिं विश्व आहा न इन्द्रः सुमतिं गन्त्वच्छ ॥

धेनुम्। न। त्वा। सुऽयवसे। दुधुक्षन्। उप। ब्रह्माणि। ससृजे। वसिष्ठः। त्वाम्। इत्। मे। गोऽपतिम्। विश्वः। आह। आ। नः। इन्द्रः। सुऽमतिम्। गन्तु। अच्छ ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 24 Mantra » 4

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Meaning
हे राजन् ! जो (वसिष्ठः) अतीव धन (सूयवसे) सुन्दर भक्षण करने योग्य घास के निमित्त (धेनुम्) गौ की (न) जैसे वैसे (त्वा) तुम्हें (दुदुक्षन्) कामों से परिपूर्ण करता हुआ (ब्रह्माणि) बहुत अन्न वा धनों को (उप, ससृजे) सिद्ध करता है (मे) मेरी (गोपतिम्) इन्द्रियों की पालना करनेवाले (त्वाम्) तुम्हें (विश्वः) सब जन जो (आह) कहे (इत्) उसी (नः) हमारी (सुमतिम्) सुन्दर मति को (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्त राजा आप (अच्छ, आ, गन्तु) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । यदि आप हम लोगों को विद्वानों की सम्मति में वर्त्तकर राज्यशासन करें वा जो कोई प्रजा जन स्वकीय सुख दुःख प्रकाश करनेवाले वचन को सुनावे, उस सब को सुन कर यथावत् समाधान दें तो आप को सब हम लोग गौ दूध से जैसे, वैसे राज्यैश्वर्य से उन्नत करें ॥४॥
Subject
राजा सर्वसम्मति से राजशासन करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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