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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 25

104 Sukta
25 Mantra
7/18/25
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मं न॑रो मरुतः सश्च॒तानु॒ दिवो॑दासं॒ न पि॒तरं॑ सु॒दासः॑। अ॒वि॒ष्टना॑ पैजव॒नस्य॒ केतं॑ दू॒णाशं॑ क्ष॒त्रम॒जरं॑ दुवो॒यु ॥२५॥

इ॒मम् । न॒रः॒ । म॒रु॒तः॒ । स॒श्च॒त॒ । अनु॑ । दिवः॑ऽदासम् । न । पि॒तर॑म् । सु॒ऽदासः॑ । अ॒वि॒ष्टन॑ । पै॒ज॒ऽव॒नस्य॑ । केत॑म् । दुः॒ऽनाश॑म् । क्ष॒त्रम् । अ॒जर॑म् । दु॒वः॒ऽयु ॥

Mantra without Swara
इमं नरो मरुतः सश्चतानु दिवोदासं न पितरं सुदासः। अविष्टना पैजवनस्य केतं दूणाशं क्षत्रमजरं दुवोयु ॥

इमम्। नरः। मरुतः। सश्चत। अनु। दिवःऽदासम्। न। पितरम्। सुऽदासः। अविष्टन। पैजऽवनस्य। केतम्। दुःऽनाशम्। क्षत्रम्। अजरम्। दुवःऽयु ॥२५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 28 Mantra » 5

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Meaning
हे (नरः) नायक (मरुतः) मनुष्यो ! जो (सुदासः) उत्तम दान देनेवाला हो (इमम्) उस (दिवोदासम्) विद्याप्रकाश देनेवाले को (पितरम्) पालनेवाले पिता के (न) समान तुम लोग (सश्चत) मिलो, सम्बन्ध करो और (पैजवनस्य) क्षमाशील है जिसका उससे उत्पन्न हुए पुत्र के (दूणाशम्) दुःख से नाश करने योग्य पदार्थ वा दुर्लभ विनाश (केतम्) उत्तम बुद्धि और (अजरम्) विनाशरहित (दुवोयु) सेवन करने के लिये मनोहर (क्षत्रम्) राज्य वा धन को (अनु, अविष्टन) व्याप्त होओ ॥२५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । यदि मनुष्य विद्यादि शुभ गुणों के देनेवाले, पिता के समान =पालक राजा का आश्रय करें तो पूर्ण प्रज्ञा अविनाशि सेवने योग्य ऐश्वर्य और राज्य को स्थिर कर सकें ॥२५॥ इस सूक्त में इन्द्र, राजा, प्रजा, मित्र, धार्मिक, अमात्य, शत्रुनिवारण तथा धार्मिक सत्कार के अर्थ का प्रतिपादन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह अठारहवाँ सूक्त और अट्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर मनुष्य कैसे राजा को अच्छे प्रकार आश्रय करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥