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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 23

104 Sukta
25 Mantra
7/18/23
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
च॒त्वारो॑ मा पैजव॒नस्य॒ दानाः॒ स्मद्दि॑ष्टयः कृश॒निनो॑ निरे॒के। ऋ॒ज्रासो॑ मा पृथिवि॒ष्ठाः सु॒दास॑स्तो॒कं तो॒काय॒ श्रव॑से वहन्ति ॥२३॥

च॒त्वारः॑ । मा॒ । पै॒ज॒ऽव॒नस्य॑ । दानाः॑ । स्मत्ऽदि॑ष्टयः । कृ॒श॒निनः॑ । नि॒रे॒के । ऋ॒ज्रासः॑ । मा॒ । पृ॒थि॒वि॒ऽस्थाः । सु॒ऽदासः॑ । तो॒कम् । तो॒काय॑ । श्रव॑से । व॒ह॒न्ति॒ ॥

Mantra without Swara
चत्वारो मा पैजवनस्य दानाः स्मद्दिष्टयः कृशनिनो निरेके। ऋज्रासो मा पृथिविष्ठाः सुदासस्तोकं तोकाय श्रवसे वहन्ति ॥

चत्वारः। मा। पैजऽवनस्य। दानाः। स्मत्ऽदिष्टयः। कृशनिनः। निरेके। ऋज्रासः। मा। पृथिविऽस्थाः। सुऽदासः। तोकम्। तोकाय। श्रवसे। वहन्ति ॥२३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 28 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (पैजवनस्य) क्षमाशील रखनेवाले के पुत्र आपके जैसे (चत्वारः) चार ऋत्विज् (दानाः) देनेवाले (स्मद्दिष्टयः) जिनके निश्चित दर्शन (कृशनिनः) वा बहुत हिरण्य विद्यमान (ऋज्रासः) जो सरल स्वभाव (पृथिविष्ठाः) पृथिवी पर स्थित रहते हैं वे विद्वान् जन (निरेके) निःशङ्क राज्यव्यवहार में (मा) मुझे विधान करते हैं, स्थिर करते हैं (श्रवसे) विद्या सुनने के लिये (तोकाय) सन्तान के अर्थ (मा) मुझ (तोकम्) सन्तान को (वहन्ति) पहुँचाते हैं, वैसे उनके प्रति आप (सुदासः) सुन्दर दानशील हूजिये ॥२३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! वेदवेत्ता ऋत्विज् ब्राह्मण राजसहाय से यज्ञानुष्ठान से सब का निश्चित सुख बढ़ाते हैं और जैसे ब्रह्मचारी सन्तान के लिये ब्रह्मचर्य्य से पहिले विद्या पढ़ने के लिये विवाह कर सन्तान उत्पन्न करते हैं, वैसे राजजन और राजपुरुष सब के हित के लिये ब्रह्मचर्य्य से विद्या ग्रहण कराकर सब के सुख की उन्नति करें ॥२३॥
Subject
फिर वे राजा आदि क्या अनुष्ठान करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥