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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 22

104 Sukta
25 Mantra
7/18/22
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
द्वे नप्तु॑र्दे॒वव॑तः श॒ते गोर्द्वा रथा॑ व॒धूम॑न्ता सु॒दासः॑। अर्ह॑न्नग्ने पैजव॒नस्य॒ दानं॒ होते॑व॒ सद्म॒ पर्ये॑मि॒ रेभ॑न् ॥२२॥

द्वे इति॑ । नप्तुः॑ । दे॒वऽव॑तः । श॒ते इति॑ । गोः । द्वा । रथा॑ । व॒धूऽम॑न्ता । सु॒ऽदासः॑ । अर्ह॑न् । अ॒ग्ने॒ । पै॒ज॒ऽव॒नस्य॑ । दान॑म् । होता॑ऽइव । सद्म॑ । परि॑ । ए॒भि॒ । रेभ॑न् ॥

Mantra without Swara
द्वे नप्तुर्देववतः शते गोर्द्वा रथा वधूमन्ता सुदासः। अर्हन्नग्ने पैजवनस्य दानं होतेव सद्म पर्येमि रेभन् ॥

द्वे इति। नप्तुः। देवऽवतः। शते इति। गोः। द्वा। रथा। वधूऽमन्ता। सुऽदासः। अर्हन्। अग्ने। पैजऽवनस्य। दानम्। होताऽइव। सद्म। परि। एमि। रेभन् ॥२२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 28 Mantra » 2

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Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! जैसे (अर्हन्) सत्कार करता हुआ (सुदासः) उत्तम दानशील मैं (दानम्) दान (होतेव) देनेवाले के समान (सद्म) घर को वा (पैजनवस्य) वेगवान् (नप्तुः) पौत्र के स्थान को (पर्येमि) सब ओर से जाता हूँ और (देववतः) प्रशंसित गुणवाले विद्वानों से युक्त की (गोः) धेनु वा भूमिसम्बन्धी (द्वे) दो (शते) सौ (वधूमन्ता) प्रशंसायुक्त वधूवाले (द्वा) दो (रथा) जल-स्थल में जानेवाले रथों को सब ओर से प्राप्त होता हूँ वा जैसे विद्वान् जन (रेभन्) स्तुति करते हैं, उनको सब ओर से जाता हूँ, वैसे आप हूजिये ॥२२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो ! जैसे देनेवाले उत्तम दान देते और पौत्रपर्य्यन्त धनधान्य और पशु आदि की समृद्धि करते हैं, वैसे सब को वर्त्तना चाहिये ॥२२॥
Subject
फिर वह राजा किसके तुल्य क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥