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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 21

104 Sukta
25 Mantra
7/18/21
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र ये गृ॒हादम॑मदुस्त्वा॒या प॑राश॒रः श॒तया॑तु॒र्वसि॑ष्ठः। न ते॑ भो॒जस्य॑ स॒ख्यं मृ॑ष॒न्ताधा॑ सू॒रिभ्यः॑ सु॒दिना॒ व्यु॑च्छान् ॥२१॥

प्र । ये । गृ॒हात् । अम॑मदुः । त्वा॒ऽया । प॒रा॒ऽश॒रः । श॒तऽया॑तुः । वसि॑ष्ठः । न । ते॒ । भो॒जस्य॑ । स॒ख्यम् । मृ॒ष॒न्त॒ । अध॑ । सू॒रिऽभ्यः॑ । सु॒ऽदिना॑ । वि । उ॒च्छा॒न् ॥

Mantra without Swara
प्र ये गृहादममदुस्त्वाया पराशरः शतयातुर्वसिष्ठः। न ते भोजस्य सख्यं मृषन्ताधा सूरिभ्यः सुदिना व्युच्छान् ॥

प्र। ये। गृहात्। अममदुः। त्वाऽया। पराऽशरः। शतऽयातुः। वसिष्ठः। न। ते। भोजस्य। सख्यम्। मृषन्त। अध। सूरिऽभ्यः। सुऽदिना। वि। उच्छान् ॥२१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 28 Mantra » 1

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Meaning
हे राजन् (ये) जो (त्वाया) तुम्हारी नीति के साथ (गृहात्) घर से (अममदुः) आनन्दित होते हैं वा (शतयातुः) जो सैकड़ों के साथ जाता है जो (वसिष्ठः) अतीव वसनेवाला और जो (पराशरः) दुष्टों का हिंसक आनन्दित होता है (ते) वे (भोजस्य) भोगने और पालन करने की (सख्यम्) मित्रता को (न) नहीं (प्र, मृषन्त) सहते हैं (अध) इसके अनन्तर जो (सूरिभ्यः) विद्वानों से (सुदिना) सुखयुक्त दिनों में (व्युच्छान्) निरन्तर वसें, वे तुमको सदा सत्कार करने योग्य हैं ॥२१॥
Essence
जिसकी विद्या, विनय और सुशीलता से सब गृहस्थ आदि मनुष्य आनन्दित हों और जो औरों का उत्कर्ष देखकर पीड़ित होते हैं और जो विद्वानों से सर्वदैव सुन्दर शिक्षा लेते हैं, वे सब सुख पाते हैं ॥२१॥
Subject
फि राजा के सहाय से प्रजाजन क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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