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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 20

104 Sukta
25 Mantra
7/18/20
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न त॑ इन्द्र सुम॒तयो॒ न रायः॑ सं॒चक्षे॒ पूर्वा॑ उ॒षसो॒ न नूत्नाः॑। देव॑कं चिन्मान्यमा॒नं ज॑घ॒न्थाव॒ त्मना॑ बृह॒तः शम्ब॑रं भेत् ॥२०॥

न । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । सु॒ऽम॒तयः॑ । न । रायः॑ । स॒म्ऽचक्षे॑ । पूर्वाः॑ । उ॒षसः॑ । न । नूत्नाः॑ । देव॑कम् । चि॒त् । मा॒न्य॒मा॒नम् । ज॒घ॒न्थ॒ । अव॑ । त्मना॑ । बृ॒ह॒तः । शम्ब॑रम् । भे॒त् ॥

Mantra without Swara
न त इन्द्र सुमतयो न रायः संचक्षे पूर्वा उषसो न नूत्नाः। देवकं चिन्मान्यमानं जघन्थाव त्मना बृहतः शम्बरं भेत् ॥

न। ते। इन्द्र। सुऽमतयः। न। रायः। सम्ऽचक्षे। पूर्वाः। उषसः। न। नूत्नाः। देवकम्। चित्। मान्यमानम्। जघन्थ। अव। त्मना। बृहतः। शम्बरम्। भेत् ॥२०॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 27 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्र) सुख देनेवाले (ते) आपके (पूर्वाः) पहिली और (नूत्नाः) नवीन (उषसः) उषा वेलाओं के (न) समान वा (सुमतयः) उत्तम बुद्धिमानों के (न) समान (रायः) धनों को (संचक्षे) अच्छे प्रकार कहने को कोई भी (न) नहीं (जघन्थ) मारता है वा जैसे सूर्य (बृहतः) बड़े से बड़े (शम्बरम्) मेघदल को (भेत्) विदीर्ण करता, वैसे जिसे (त्मना) अपने से आप (अव) नष्ट करते हैं (चित्) उसके समान (मान्यमानम्) मान्यों का सत्कार जिसमें है उस (देवकम्) देव समान वर्त्तमान का सत्कार करें तो प्रजा सब ओर से बढ़े ॥२०॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे राजन् ! जैसे पिछली और नई होनेवाली प्रभात वेला सर्वथा मङ्गल करनेवाली हैं, वैसे यदि न्याय से इकट्ठे किये हुए धन से धार्मिक और उत्तम बुद्धिवाले जनों का सत्कार कर उन उक्त मनुष्यों की रक्षा कर इनसे राज्य के कार्य्यों को साधिये और वहाँ मेघ को सूर्य के समान दुष्टों को मार श्रेष्ठों को प्रसन्न रखिये तो आपकी सब ओर से वृद्धि हो ॥२०॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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