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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 17

104 Sukta
25 Mantra
7/18/17
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ॒ध्रेण॑ चि॒त्तद्वेकं॑ चकार सिं॒ह्यं॑ चि॒त्पेत्वे॑ना जघान। अव॑ स्र॒क्तीर्वे॒श्या॑वृश्च॒दिन्द्रः॒ प्राय॑च्छ॒द्विश्वा॒ भोज॑ना सु॒दासे॑ ॥१७॥

आ॒ध्रेण॑ । चि॒त् । तत् । ऊँ॒ इति॑ । एक॑म् । च॒का॒र॒ । सिं॒ह्य॑म् । चि॒त् । पेत्वे॑न । ज॒घा॒न॒ । अव॑ । स्र॒क्तीः । वे॒श्या॑ । अ॒वृ॒श्च॒त् । इन्द्रः॑ । प्र । अ॒य॒च्छ॒त् । विश्वा॑ । भोज॑ना । सु॒ऽदासे॑ ॥

Mantra without Swara
आध्रेण चित्तद्वेकं चकार सिंह्यं चित्पेत्वेना जघान। अव स्रक्तीर्वेश्यावृश्चदिन्द्रः प्रायच्छद्विश्वा भोजना सुदासे ॥

आध्रेण। चित्। तत्। ऊँ इति। एकम्। चकार। सिंह्यम्। चित्। पेत्वेन। जघान। अव। स्रक्तीः। वेश्या। अवृश्चत्। इन्द्रः। प्र। अयच्छत्। विश्वा। भोजना। सुऽदासे ॥१७॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 27 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (इन्द्रः) दुष्टों के समूह को विदारनेवाला (स्रक्तीः) रची हुई सेनाओं को (वेश्या) सूचना से (अवृश्चत्) छिन्न-भिन्न करता (आध्रेण) सब ओर से धारण किये विषय से (चित्) ही (तत्) उस (एकम्, उ) एक को (चकार) सिद्ध करता (सिंह्यम्) सिंहों में उत्पन्न हुए बल के समान (चित्) ही (पेत्वेन) पहुँचाने से (अव, जघान) शत्रुओं को मारता और (विश्वा) समस्त (भोजना) अन्नादि पदार्थों को (प्र, अयच्छत्) देता है उस (सुदासे) अच्छे देनेवाले के होते वीरजन कैसे नहीं शत्रुओं को जीतें ॥१७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो वीर सिंह के समान पराक्रम पर शत्रुओं को मारते हैं और भूगोल में एक अखण्डित राज्य करने को अच्छा यत्न करते हैं, वे समग्र बल को विधान कर और वीरों को सत्कार कर बुद्धिमानों से राज्य की शिक्षा दिलाने को प्रवृत्त हों ॥१७॥
Subject
कौन शत्रुओं के जीतने में योग्य होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥