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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 16

104 Sukta
25 Mantra
7/18/16
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒र्धं वी॒रस्य॑ शृत॒पाम॑नि॒न्द्रं परा॒ शर्ध॑न्तं नुनुदे अ॒भि क्षाम्। इन्द्रो॑ म॒न्युं म॑न्यु॒म्यो॑ मिमाय भे॒जे प॒थो व॑र्त॒निं पत्य॑मानः ॥१६॥

अ॒र्धम् । वी॒रस्य॑ । शृ॒त॒ऽपाम् । अ॒नि॒न्द्रम् । परा॑ । शर्ध॑न्तम् । नु॒नु॒दे॒ । अ॒भि । क्षाम् । इन्द्रः । म॒न्युम् । म॒न्यु॒ऽभ्यः॑ । मि॒मा॒य॒ । भे॒जे । प॒थः । व॒र्त॒निम् । पत्य॑मानः ॥

Mantra without Swara
अर्धं वीरस्य शृतपामनिन्द्रं परा शर्धन्तं नुनुदे अभि क्षाम्। इन्द्रो मन्युं मन्युम्यो मिमाय भेजे पथो वर्तनिं पत्यमानः ॥

अर्धम्। वीरस्य। शृतऽपाम्। अनिन्द्रम्। परा। शर्धन्तम्। नुनुदे। अभि। क्षाम्। इन्द्रः। मन्युम्। मन्युऽम्यः। मिमाय। भेजे। पथः। वर्तनिम्। पत्यमानः ॥१६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 27 Mantra » 1

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Meaning
जो (क्षाम्) भूमि को (पत्यमानः) पति के समान आचरण करता हुआ (इन्द्रः) ऐश्वर्ययुक्त शत्रुओं को विदीर्ण करनेवाला (वीरस्य) शुभ गुणों में व्याप्त राजा (शृतपाम्) पके हुए दूध को पीने वा (अर्द्धम्) वर्षने वा (शर्धन्तम्) बल करनेवाले सेनापति को पाकर (अनिन्द्रम्) अनैश्वर्य को (पराणुनुदे) दूर करता है वा जो (मन्युम्यः) क्रोध को नष्ट करनेवाला शत्रुओं पर (मन्युम्) क्रोध को (अभि) सम्मुख से (मिमाय) मानता (पथः) वा मार्गों को और (वर्त्तनिम्) जिसमें वर्त्तमान होते हैं उस न्याय-मार्ग को (भेजे) सेवता है, वही राजजनों में श्रेष्ठ और राजराजेश्वर होता है ॥१६॥
Essence
जो राजा वीर जनों की बल वृद्धि करके दुष्टों पर क्रोध करता और धार्मिकों पर आनन्ददृष्टि हो तथा न्याययुक्त मार्ग का अनुगामी होता हुआ ऐश्वर्य को पैदा करता है, वही सर्वदा वृद्धि को प्राप्त होता है ॥१६॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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