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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 15

104 Sukta
25 Mantra
7/18/15
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रे॑णै॒ते तृत्स॑वो॒ वेवि॑षाणा॒ आपो॒ न सृ॒ष्टा अ॑धवन्त॒ नीचीः॑। दु॒र्मि॒त्रासः॑ प्रकल॒विन्मिमा॑ना ज॒हुर्विश्वा॑नि॒ भोज॑ना सु॒दासे॑ ॥१५॥

इन्द्रे॑ण । ए॒ते । तृत्स॑वः । वेवि॑षाणाः । आपः॑ । न । सृ॒ष्टाः । अ॒ध॒व॒न्त॒ । नीचीः॑ । दुः॒ऽमि॒त्रासः॑ । प्र॒क॒ल॒ऽवित् । मिमा॑नाः । ज॒हुः । विश्वा॑नि । भोज॑ना । सु॒ऽदासे॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रेणैते तृत्सवो वेविषाणा आपो न सृष्टा अधवन्त नीचीः। दुर्मित्रासः प्रकलविन्मिमाना जहुर्विश्वानि भोजना सुदासे ॥

इन्द्रेण। एते। तृत्सवः। वेविषाणाः। आपः। न। सृष्टाः। अधवन्त। नीचीः। दुःऽमित्रासः। प्रकलऽवित्। मिमानाः। जहुः। विश्वानि। भोजना। सुऽदासे ॥१५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 26 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (एते) ये (इन्द्रेण) परमैश्वर्ययुक्त राजा के साथ (तृत्सवः) शत्रुओं को मारनेवाले (वेविषाणाः) शत्रुओं के बलों को व्याप्त होते हुए (आपः) जलों के (न) समान (सृष्टाः) शत्रुओं पर नियम से रक्खे और (विश्वानि) समस्त (भोजना) भोजनों को (मिमानाः) उत्पन्न करते हुए जो (दुर्मित्रासः) दुष्ट मित्रोंवाले हों उनकी जो सेना हैं वे (नीचीः) नीचे जाती और (अधवन्त) कम्पती हैं उन पर जो शस्त्र अस्त्रों को (जहुः) छोड़ते हैं और जो परमैश्वर्ययुक्त राजा (सुदासे) श्रेष्ठ देनेवाले के निमित्त (प्रकलवित्) अच्छे प्रकार संख्या का जाननेवाला है, वे सब विजयभागी होते हैं ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जिनकी समुद्र की तरङ्गों के समान, उत्साहयुक्त, बलिष्ठ सेना हों, वे शत्रुओं की सेनाओं को नीचे गिरा शीघ्र उन्हें जीत सकते हैं ॥१५॥
Subject
किस के साथ कौन क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥