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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 14

104 Sukta
25 Mantra
7/18/14
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
नि ग॒व्यवोऽन॑वो द्रु॒ह्यव॑श्च ष॒ष्टिः श॒ता सु॑षुपुः॒ षट् स॒हस्रा॑। ष॒ष्टिर्वी॒रासो॒ अधि॒ षड् दु॑वो॒यु विश्वेदिन्द्र॑स्य वी॒र्या॑ कृ॒तानि॑ ॥१४॥

न् । ग॒व्यवः॑ । अन॑वः । दु॒ह्यवः॑ । च॒ । ष॒ष्टिः । श॒ता । सु॒सु॒पुः॒ । षट् । स॒हस्रा॑ । ष॒ष्टिः । वी॒रासः॑ । अधि॑ । षट् । दु॒वः॒ऽयु । विश्वा॑ । इत् । इन्द्र॑स्य । वी॒र्या॑ । कृ॒तानि॑ ॥

Mantra without Swara
नि गव्यवोऽनवो द्रुह्यवश्च षष्टिः शता सुषुपुः षट् सहस्रा। षष्टिर्वीरासो अधि षड् दुवोयु विश्वेदिन्द्रस्य वीर्या कृतानि ॥

नि। गव्यवः। अनवः। दुह्यवः। च। षष्टिः। शता। सुसुपुः। षट्। सहस्रा। षष्टिः। वीरासः। अधि। षट्। दुवःऽयु। विश्वा। इत्। इन्द्रस्य। वीर्या। कृतानि ॥१४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 26 Mantra » 4

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Meaning
जिन्होंने (इन्द्रस्य) परमैश्वर्ययुक्त राजा के (विश्वा) समस्त (इत्) ही (वीर्या) पराक्रम (कृतानि) उत्पन्न किये वे (गव्यवः) अपने को भूमि चाहते (द्रुह्यवः) और दुष्ट अधर्मी जनों को मारने की इच्छा करते हुए (अनवः, षष्टिः, वीरासः) साठ वीर अर्थात् शरीर और आत्मा के बल और शूरता से युक्त मनुष्य (षट् सहस्रा) छः सहस्र शत्रुओं को (अधि) अधिकता से जीतते हैं वे (च) भी (षट्, षष्टिः, शता) छासठ सैंकड़े शत्रु (दुवोयु) जो सेवन की कामना करता है, उसके लिये (नि, सुषुपुः) निरन्तर सोते हैं ॥१४॥
Essence
जहाँ राजा और प्रजा सेनाओं में प्रजा और सेना बिजुली के समान पूरण बल और पराक्रम युक्त सेना को बढ़वाते हैं, वहाँ साठ योद्धा छः हजार शत्रुओं को भी जीत सकते हैं ॥१४॥
Subject
राजादि मनुष्यों से कितना बल बढ़वाना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥