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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 11

104 Sukta
25 Mantra
7/18/11
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
एकं॑ च॒ यो विं॑श॒तिं च॑ श्रव॒स्या वै॑क॒र्णयो॒र्जना॒न्राजा॒ न्यस्तः॑। द॒स्मो न सद्म॒न्नि शि॑शाति ब॒र्हिः शूरः॒ सर्ग॑मकृणो॒दिन्द्र॑ एषाम् ॥११॥

एक॑म् । च॒ । यः । विं॒श॒तिम् । च॒ । श्र॒व॒स्या । वै॒क॒र्णयोः॑ । जना॑न् । राजा॑ । नि । अस्तः॑ । द॒स्मः । न । सद्म॑न् । नि । शि॒शा॒ति॒ । ब॒र्हिः । शूरः॑ । सर्ग॑म् । अ॒कृ॒णो॒त् । इन्द्रः॑ । ए॒षा॒म् ॥

Mantra without Swara
एकं च यो विंशतिं च श्रवस्या वैकर्णयोर्जनान्राजा न्यस्तः। दस्मो न सद्मन्नि शिशाति बर्हिः शूरः सर्गमकृणोदिन्द्र एषाम् ॥

एकम्। च। यः। विंशतिम्। च। श्रवस्या। वैकर्णयोः। जनान्। राजा। नि। अस्तः। दस्मः। न। सद्मन्। नि। शिशाति। बर्हिः। शूरः। सर्गम्। अकृणोत्। इन्द्रः। एषाम् ॥११॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 26 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (दस्मः) दुःख के विनाश करनेवाले के (न) समान (वैकर्णयोः) विविध प्रकार के कानों में उत्पन्न हुए व्यवहारों का (नि, अस्तः) निरन्तर प्रक्षेपण करने अर्थात् औरों के कानों में डालनेवाला (राजा) विराजमान (जनान्) मनुष्यों को (सद्मन्) जिसमें बैठते हैं उस घर में (नि, शिशाति) निरन्तर तीक्ष्ण करता है और (विंशतिम्, च, एकम्, च) बीस और एक भी अर्थात् इक्कीस (श्रवस्या) अन्न में उत्तम गुण देनेवालों को (अकृणोत्) सिद्ध करता है वह (एषाम्) इन वीर मनुष्यों के बीच (इन्द्रः) सूर्य (बर्हिः) अच्छे प्रकार बड़े हुए (सर्गम्) जल को जैसे वैसे (शूरः) निर्भय शत्रुओं को जीतता है ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो राजा मनुष्यों के पुत्र के समान पालता, अहिंसक के समान सब को आनन्दित कराता और सूर्य के समान न्यायविद्या और बलों को प्रकाशित कर शत्रुओं को जीतता है, वही सब सुखों को प्राप्त होता है ॥११॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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