Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 10

104 Sukta
25 Mantra
7/18/10
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ई॒युर्गावो॒ न यव॑सा॒दगो॑पा यथाकृ॒तम॒भि मि॒त्रं चि॒तासः॑। पृश्नि॑गावः॒ पृश्नि॑निप्रेषितासः श्रु॒ष्टिं च॑क्रुर्नि॒युतो॒ रन्त॑यश्च ॥१०॥

ई॒युः । गावः॑ । न । यव॑सात् । अगो॑पाः । य॒था॒ऽकृ॒तम् । अ॒भि । मि॒त्रम् । चि॒तासः॑ । पृश्नि॑ऽगावः । पृश्नि॑ऽनिप्रेषितासः । श्रु॒ष्टिम् । च॒क्रुः॒ । नि॒ऽयुतः॑ । रन्त॑यः । च॒ ॥

Mantra without Swara
ईयुर्गावो न यवसादगोपा यथाकृतमभि मित्रं चितासः। पृश्निगावः पृश्निनिप्रेषितासः श्रुष्टिं चक्रुर्नियुतो रन्तयश्च ॥

ईयुः। गावः। न। यवसात्। अगोपाः। यथाऽकृतम्। अभि। मित्रम्। चितासः। पृश्निऽगावः। पृश्निऽनिप्रेषितासः। श्रुष्टिम्। चक्रुः। निऽयुतः। रन्तयः। च ॥१०॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यवसात्) भक्षण करने योग्य घास आदि से (अगोपाः) जिनकी रक्षा विद्यमान नहीं वे (गावः) गौयें (न) जैसे वा जैसे (अभिमित्रम्) सम्मुख मित्र, वैसे (चितासः) संचय अर्थात् संचित पदार्थों से युक्त जीव (यथाकृतम्) जैसे किया कर्म, वैसे उसके फल को (ईयुः) प्राप्त हों वा पहुँचें वा जैसे (पृश्निगावः) अन्तरिक्ष के तुल्य किरणों से युक्त (पृश्निनिप्रेषितासः) अन्तरिक्ष में निरन्तर प्रेषित किये हुए (नियुतः) निश्चित गतिवाले वायु और (रन्तयः) जिनमें रमते हैं वे वायु (च) (श्रुष्टिम्) शीघ्रता (चक्रुः) करते हैं, उसी प्रकार जो कर्म करते हैं, वे वैसा ही फल पाते हैं ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे चरवाहों से रहित गौयें अपने बछड़ों को और वायु अन्तरिक्षस्थ किरणों को और मित्र मित्र को प्राप्त होता है, वैसे ही अपने किये हुए शुभ अशुभ कर्मों को जीव ईश्वरव्यवस्था से प्राप्त होते हैं ॥१०॥
Subject
फिर जीव अपने-अपने किये हुए कर्म के फल को प्राप्त होते ही हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥