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Rigveda Mandal 7 / Sukta 18 / Mantra 1

104 Sukta
25 Mantra
7/18/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वे ह॒ यत्पि॒तर॑श्चिन्न इन्द्र॒ विश्वा॑ वा॒मा ज॑रि॒तारो॒ अस॑न्वन्। त्वे गावः॑ सु॒दुघा॒स्त्वे ह्यश्वा॒स्त्वं वसु॑ देवय॒ते वनि॑ष्ठः ॥१॥

त्वे इति॑ । ह॒ । यत् । पि॒तरः॑ । चि॒त् । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । विश्वा॑ । वा॒मा । ज॒रि॒तारः॑ । अस॑न्वन् । त्वे इति॑ । गावः॑ । सु॒ऽदुघाः॑ । त्वे इति॑ । हि । अश्वाः॑ । त्वम् । वसु॑ । दे॒व॒ऽय॒ते । वनि॑ष्ठः ॥

Mantra without Swara
त्वे ह यत्पितरश्चिन्न इन्द्र विश्वा वामा जरितारो असन्वन्। त्वे गावः सुदुघास्त्वे ह्यश्वास्त्वं वसु देवयते वनिष्ठः ॥

त्वे इति। ह। यत्। पितरः। चित्। नः। इन्द्र। विश्वा। वामा। जरितारः। असन्वन्। त्वे इति। गावः। सुऽदुघाः। त्वे इति। हि। अश्वाः। त्वम्। वसु। देवऽयते। वनिष्ठः ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 24 Mantra » 1

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Meaning
हे (इन्द्र) राजन् ! (त्वे) आपके होते (यत्) जो (नः) हमारे (पितरः) ऋतुओं के समान पालना करनेवाले (चित्) और (जरितारः) स्तुतिकर्ता जन (विश्वा) समस्त (वामा) प्रशंसा करने योग्य पदार्थों की (असन्वन्) याचना करते हैं (त्वे, ह) आपके होते (सुदुघाः) सुन्दर काम पूरनेवाली (गावः) गौएँ हैं, उनको माँगते हैं (त्वे, हि) आप ही के होते (अश्वाः) जो बड़े-बड़े घोड़े हैं उनको माँगते हैं जो आप (देवयते) कामना करनेवाले के लिये (वनिष्ठः) अतीव पदार्थों को अलग करनेवाले होते हुए (वसु) धन देते हैं सो (त्वम्) आप सब को सेवा करने योग्य हैं ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यदि राजा सूर्य के समान विद्या और न्याय का प्रकाशक हो तो सम्पूर्ण राज्य कामना से अलङ्कृत होकर राजा को पूर्ण कामनावाला करे तथा धार्मिक जन धर्म का आचरण करें और अधार्मिक जन भी पापाचरण को छोड़ धर्मात्मा होवें ॥१॥
Subject
अब पच्चीस ऋचावाले अठारहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा कैसा श्रेष्ठ होता है, इस विषय को कहते हैं ॥

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