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Rigveda Mandal 7 / Sukta 17 / Mantra 3

104 Sukta
7 Mantra
7/17/3
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- आर्च्युष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अग्ने॑ वी॒हि ह॒विषा॒ यक्षि॑ दे॒वान्त्स्व॑ध्व॒रा कृ॑णुहि जातवेदः ॥३॥

अग्ने॑ । वी॒हि । ह॒विषा॑ । यक्षि॑ । दे॒वान् । सु॒ऽअ॒ध्व॒रा । कृ॒णु॒हि॒ । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ ॥

Mantra without Swara
अग्ने वीहि हविषा यक्षि देवान्त्स्वध्वरा कृणुहि जातवेदः ॥

अग्ने। वीहि। हविषा। यक्षि। देवान्। सुऽअध्वरा। कृणुहि। जातऽवेदः ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
हे (जातवेदः) विद्या को प्राप्त (अग्ने) अग्नि के तुल्य तीव्रबुद्धिवाले विद्यार्थिन् ! तू विद्युत् के तुल्य (हविषा) ग्रहण किये पुरुषार्थ से विद्याओं को (वीहि) प्राप्त हो (देवान्) विद्वान् अध्यापकों का (यक्षि) सङ्ग कर और (स्वध्वरा) सुन्दर अहिंसारूप व्यवहारवाले कामों को (कृणुहि) कर ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । विद्यार्थिजन जैसे विद्युत् मार्ग को शीघ्र व्याप्त होते, वैसे पुरुषार्थ से शीघ्र विद्याओं को प्राप्त हों और अध्यापक पुरुष उनको शीघ्र विद्वान् करें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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