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Rigveda Mandal 7 / Sukta 17 / Mantra 1

104 Sukta
7 Mantra
7/17/1
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- आर्च्युष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अग्ने॒ भव॑ सुष॒मिधा॒ समि॑द्ध उ॒त ब॒र्हिरु॑र्वि॒या वि स्तृ॑णीताम् ॥१॥

अग्ने॑ । भव॑ । सु॒ऽस॒मिधा॑ । सम्ऽइ॑द्धः । उ॒त । ब॒र्हिः । उ॒र्वि॒या । वि । स्तृ॒णी॒ता॒म् ॥

Mantra without Swara
अग्ने भव सुषमिधा समिद्ध उत बर्हिरुर्विया वि स्तृणीताम् ॥

अग्ने। भव। सुऽसमिधा। सम्ऽइद्धः। उत। बर्हिः। उर्विया। वि। स्तृणीताम् ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन् ! जैसे (सुषमिधा) समिधा के तुल्य शोभायुक्त धर्मानुकूल क्रिया से (समिद्धः) प्रदीप्त अग्नि होता है, वैसे (भव) हूजिये (उत) और जैसे अग्नि (उर्विया) पृथिवी के साथ (बर्हिः) बढ़े हुए जल का विस्तार करता है, वैसे प्रकार होकर आप (वि, स्तृणीताम्) विस्तार कीजिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इन्धनों से अग्नि प्रदीप्त होता, वर्षा जल से पृथिवी को आच्छादित करता है, वैसे ही ब्रह्मचर्य्य, सुशीलता और पुरुषार्थ से विद्यार्थी जन सुप्रकाशित होकर जिज्ञासुओं के हृदयों में विद्या का विस्तार करते हैं ॥१॥
Subject
अब विद्यार्थी किसके तुल्य कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥