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Rigveda Mandal 7 / Sukta 16 / Mantra 9

104 Sukta
12 Mantra
7/16/9
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स म॒न्द्रया॑ च जि॒ह्वया॒ वह्नि॑रा॒सा वि॒दुष्ट॑रः। अग्ने॑ र॒यिं म॒घव॑द्भ्यो न॒ आ व॑ह ह॒व्यदा॑तिं च सूदय ॥९॥

सः । म॒न्द्रया॑ । च॒ । जि॒ह्वया॑ । वह्निः॑ । आ॒सा । वि॒दुःऽत॑रः । अग्ने॑ । र॒यिम् । म॒घव॑त्ऽभ्यः । नः॒ । आ । व॒ह॒ । ह॒व्यऽदा॑तिम् । च॒ । सू॒द॒य॒ ॥

Mantra without Swara
स मन्द्रया च जिह्वया वह्निरासा विदुष्टरः। अग्ने रयिं मघवद्भ्यो न आ वह हव्यदातिं च सूदय ॥

सः। मन्द्रया। च। जिह्वया। वह्निः। आसा। विदुःऽतरः। अग्ने। रयिम्। मघवत्ऽभ्यः। नः। आ। वह। हव्यऽदातिम्। च। सूदय ॥९॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य न्याय से प्रकाशित राजन् ! जो (वह्निः) अग्नि के तुल्य वर्त्तमान विद्या और सुख प्राप्त करनेवाले (विदुष्टरः) अत्यन्त विद्वान् हैं (सः) सो आप (मन्द्रया) प्रशंसित आनन्द देनेवाली (जिह्वया) सत्य भाषणयुक्त वाणी से (च) और (आसा) मुख से (मघवद्भ्यः) प्रशंसित धनवाले (नः) हम लोगों के लिये (रयिम्) धन को (आ, वह) प्राप्त कीजिये (च) और (हव्यदातिम्) होम के वा ग्रहण करने के योग्य वस्तुओं के खण्डन को (सूदय) नष्ट कीजिये ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि सब पृथिव्यादि तत्त्वों से हीरा आदि रत्नों को सब ओर से पका के देता है, वैसे राजा, धनाढ्यों के सम्बन्ध से निर्धन को धनवान् कराके सुख प्राप्त करे, सत्य मधुर वाणी से प्रजाजनों को शिक्षा करे, जिससे ये अयुक्त व्यवहार में धनहानि न करें ॥९॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥