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Rigveda Mandal 7 / Sukta 16 / Mantra 8

104 Sukta
12 Mantra
7/16/8
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
येषा॒मिळा॑ घृ॒तह॑स्ता दुरो॒ण आँ अपि॑ प्रा॒ता नि॒षीद॑ति। ताँस्त्रा॑यस्व सहस्य द्रु॒हो नि॒दो यच्छा॑ नः॒ शर्म॑ दीर्घ॒श्रुत् ॥८॥

येषा॑म् । इळा॑ । घृ॒तऽह॑स्ता । दु॒रो॒णे । आ । अपि॑ । प्रा॒ता । नि॒ऽसीद॑ति । तान् । त्रा॒य॒स्व॒ । स॒ह॒स्य॒ । द्रु॒हः । नि॒दः । यच्छ॑ । नः॒ । शर्म॑ । दी॒र्घ॒ऽश्रुत् ॥

Mantra without Swara
येषामिळा घृतहस्ता दुरोण आँ अपि प्राता निषीदति। ताँस्त्रायस्व सहस्य द्रुहो निदो यच्छा नः शर्म दीर्घश्रुत् ॥

येषाम्। इळा। घृतऽहस्ता। दुरोणे। आ। अपि। प्राता। निऽसीदति। तान्। त्रायस्व। सहस्य। द्रुहः। निदः। यच्छ। नः। शर्म। दीर्घऽश्रुत् ॥८॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सहस्य) बल से युक्त राजन् ! (येषाम्) जिन के (दुरोणे) घर में (घृतहस्ता) हाथ में घी लेनेवाली के तुल्य (प्राता) व्यापक (इळा) प्रशंसा योग्य वाणी (आ, निषीदति) अच्छे प्रकार निरन्तर स्थिर होती (तान्) उनकी आप (त्रायस्व) रक्षा कीजिये (दीर्घश्रुत्) दीर्घ काल तक सुननेवाले आप (नः) हमारे (शर्म) घर को (यच्छ) ग्रहण कीजिये जो (द्रुहः) द्रोही (निदः) निन्दक हैं, उनको (अपि) भी अच्छे प्रकार ग्रहण कीजिये ॥८॥
Essence
हे राजन् ! जो सत्यवाणीवाले, वेदज्ञाता हों, उनको नित्य सुख दीजिये और जो द्रोहादि दोषयुक्त आप्तों के निन्दक हैं, उनको शीघ्र दण्ड दीजिये ॥८॥
Subject
राजा को किनका पालन वा किनको दण्ड देना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥