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Rigveda Mandal 7 / Sukta 16 / Mantra 6

104 Sukta
12 Mantra
7/16/6
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
कृ॒धि रत्नं॒ यज॑मानाय सुक्रतो॒ त्वं हि र॑त्न॒धा असि॑। आ न॑ ऋ॒ते शि॑शीहि॒ विश्व॑मृ॒त्विजं॑ सु॒शंसो॒ यश्च॒ दक्ष॑ते ॥६॥

कृ॒धि । रत्न॑म् । यज॑मानाय । सु॒क्र॒तो॒ इति॑ सुऽक्रतो । त्वम् । हि । र॒त्न॒ऽधाः । असि॑ । आ । नः॒ । ऋ॒ते । शि॒शी॒हि॒ । विश्व॑म् । ऋ॒त्विज॑म् । सु॒ऽशंसः॑ । यः । च॒ । दक्ष॑ते ॥

Mantra without Swara
कृधि रत्नं यजमानाय सुक्रतो त्वं हि रत्नधा असि। आ न ऋते शिशीहि विश्वमृत्विजं सुशंसो यश्च दक्षते ॥

कृधि। रत्नम्। यजमानाय। सुक्रतो इति सुऽक्रतो। त्वम्। हि। रत्नऽधाः। असि। आ। नः। ऋते। शिशीहि। विश्वम्। ऋत्विजम्। सुऽशंसः। यः। च। दक्षते ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुक्रतो) उत्तम बुद्धि वा धर्मयुक्त कर्म करनेवाले पुरुष ! (यः) जो (सुशंसः) सुन्दर प्रशंसायुक्त जन (दक्षते) वृद्धि को प्राप्त होता उस (विश्वम्) सब (ऋत्विजम्) ऋतुओं के योग्य काम करनेवाले को (च) और (नः) हमको (ऋते) सत्यभाषणादि रूप सङ्गत करने योग्य व्यवहार में (त्वम्) आप (आ, शिशीहि) तीव्र उद्योगी कीजिये (हि) जिस कारण आप (रत्नधाः) उत्तम धनों के धारणकर्त्ता (असि) हैं इस कारण (यजमानाय) परोपकारार्थ यज्ञ करते हुए के लिये (रत्नम्) रमणीय धन को प्रकट (कृधि) कीजिये ॥६॥
Essence
इस संसार में जो पुरुष धनाढ्य हो, वह निर्धनों को उद्योग कराके निरन्तर पालन करे। जो सत् श्रेष्ठ कर्मों में बढ़ते उन्नत होते हैं, उन को धन्यवाद और धनादि पदार्थों के दान से उत्साहयुक्त करे ॥६॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥