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Rigveda Mandal 7 / Sukta 16 / Mantra 4

104 Sukta
12 Mantra
7/16/4
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
तं त्वा॑ दू॒तं कृ॑ण्महे य॒शस्त॑मं दे॒वाँ आ वी॒तये॑ वह। विश्वा॑ सूनो सहसो मर्त॒भोज॑ना॒ रास्व॒ तद्यत्त्वेम॑हे ॥४॥

तम् । त्वा॒ । दु॒तम् । कृ॒ण्म॒हे॒ । य॒शःऽत॑मम् । दे॒वान् । आ । वी॒तये॑ । व॒ह॒ । विश्वा॑ । सू॒नो॒ इति॑ । स॒ह॒सः॒ । म॒र्त॒ऽभोज॑ना । रास्व॑ । तत् । यत् । त्वा॒ । ईम॑हे ॥

Mantra without Swara
तं त्वा दूतं कृण्महे यशस्तमं देवाँ आ वीतये वह। विश्वा सूनो सहसो मर्तभोजना रास्व तद्यत्त्वेमहे ॥

तम्। त्वा। दुतम्। कृण्महे। यशःऽतमम्। देवान्। आ। वीतये। वह। विश्वा। सूनो इति। सहसः। मर्तऽभोजना। रास्व। तत्। यत्। त्वा। ईमहे ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 4

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Meaning
हे (सहसः) बलवान् के (सूनो) पुत्र विद्वन् ! जैसे हम लोग (यशस्तमम्) अतिशय कीर्ति करनेवाले (तम्) उस अग्नि को (दूतम्) दूत (कृण्महे) करते, वैसे (त्वा) आपको मुख्य करते हैं आप (वीतये) विज्ञानादि को प्राप्त करने के लिये (देवान्) दिव्य गुणों वा पदार्थों को (आ, वह) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये वा कीजिये (विश्वा) सब (मर्त्तभोजना) मनुष्यों के भोजनों वा पालनों को (रास्व) दीजिये जैसे (यत्) जिस अग्नि को कार्यसिद्धि के लिये प्रयुक्त करते, वैसे (तत्) उसको और (त्वा) आपको (ईमहे) याचना करते हैं ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सब कार्यों के साधक विद्युत् अग्नि के दूत और राजकार्यों के साधक विद्या वा विनय से युक्त पुरुष को राजा करते हैं, वे सब ऐश्वर्य और पालन को प्राप्त होते हैं ॥४॥
Subject
फिर राजादि मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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