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Rigveda Mandal 7 / Sukta 16 / Mantra 10

104 Sukta
12 Mantra
7/16/10
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ये राधां॑सि॒ दद॒त्यश्व्या॑ म॒घा कामे॑न॒ श्रव॑सो म॒हः। ताँ अंह॑सः पिपृहि प॒र्तृभि॒ष्ट्वं श॒तं पू॒र्भिर्य॑विष्ठ्य ॥१०॥

ये । राधां॑सि । दद॑ति । अश्व्या॑ । म॒घा । कामे॑न । श्रव॑सः । म॒हः । तान् । अंह॑सः । पि॒पृ॒हि॒ । प॒र्तृऽभिः । त्वम् । श॒तम् । पूः॒ऽभिः । य॒वि॒ष्ठ्य॒ ॥

Mantra without Swara
ये राधांसि ददत्यश्व्या मघा कामेन श्रवसो महः। ताँ अंहसः पिपृहि पर्तृभिष्ट्वं शतं पूर्भिर्यविष्ठ्य ॥

ये। राधांसि। ददति। अश्व्या। मघा। कामेन। श्रवसः। महः। तान्। अंहसः। पिपृहि। पर्तृऽभिः। त्वम्। शतम्। पूःऽभिः। यविष्ठ्य ॥१०॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (यविष्ठ्य) अतिशय कर जवानों में श्रेष्ठ राजन् ! (ये) जो (महः) बड़े (श्रवसः) अन्न की (कामेन) कामना से (शतम्) सैकड़ों (मघा) स्वीकार करने योग्य (अश्व्या) महत् लोगों में प्रकट होनेवाले (राधांसि) धनों को सब को (ददति) देते हैं (तान्) उनको (पर्त्तृभिः) रक्षक (पूर्भिः) नगरियों के साथ (त्वम्) आप (अंहसः) दुष्टाचरण से (पिपृहि) रक्षा कीजिये ॥१०॥
Essence
हे राजन् ! जो धर्मात्मा उद्योगी जनों को उनसे श्रम करा के धन और अन्न देते हैं, उन नगरी और पालकों के साथ वर्त्तमानों को अधर्माचरण से पृथक् रक्खो, जिससे धर्मपूर्वक उद्योग से पुष्कल धन और अन्न पाकर जगत् के हितार्थ निरन्तर दान करें ॥१०॥
Subject
फिर वह राजा प्रजाजनों के प्रति कैसे वर्त्ते, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥