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Rigveda Mandal 7 / Sukta 15 / Mantra 8

104 Sukta
15 Mantra
7/15/8
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
क्षप॑ उ॒स्रश्च॑ दीदिहि स्व॒ग्नय॒स्त्वया॑ व॒यम्। सु॒वीर॒स्त्वम॑स्म॒युः ॥८॥

क्षपः॑ । उ॒स्रः । च॒ । दी॒दि॒हि॒ । सु॒ऽअ॒ग्नयः॑ । त्वया॑ । व॒यम् । सु॒ऽवीरः॑ । त्वम् । अ॒स्म॒ऽयुः ॥

Mantra without Swara
क्षप उस्रश्च दीदिहि स्वग्नयस्त्वया वयम्। सुवीरस्त्वमस्मयुः ॥

क्षपः। उस्रः। च। दीदिहि। सुऽअग्नयः। त्वया। वयम्। सुऽवीरः। त्वम्। अस्मऽयुः ॥८॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 19 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
हे राजन् ! (अस्मयुः) हमको चाहनेवाले (सुवीरः) सुन्दर वीर पुरुषों से युक्त (त्वम्) आप (क्षपः) रात्रियों (च) और (उस्रः) किरणयुक्त दिनों में (अस्मान्) हम को (दीदिहि) प्रकाशित कीजिये (त्वया) आप के साथ (स्वग्नयः) सुन्दर अग्नियोंवाले (वयम्) हम लोग प्रतिदिन प्रकाशित हों ॥८॥
Essence
हे राजा और राजपुरुषो ! जैसे प्रतिदिन सूर्य प्रकाशित होता है, वैसे तुम लोग सदा प्रकाशित होओ ॥८॥
Subject
फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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