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Rigveda Mandal 7 / Sukta 15 / Mantra 3

104 Sukta
15 Mantra
7/15/3
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स नो॒ वेदो॑ अ॒मात्य॑म॒ग्नी र॑क्षतु वि॒श्वतः॑। उ॒तास्मान् पा॒त्वंह॑सः ॥३॥

सः । नः॒ । वेदः॑ । अ॒मात्य॑म् । अ॒ग्निः । र॒क्ष॒तु॒ । वि॒श्वतः॑ । उ॒त । अ॒स्मान् । पा॒तु॒ । अंह॑सः ॥

Mantra without Swara
स नो वेदो अमात्यमग्नी रक्षतु विश्वतः। उतास्मान् पात्वंहसः ॥

सः। नः। वेदः। अमात्यम्। अग्निः। रक्षतु। विश्वतः। उत। अस्मान्। पातु। अंहसः ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(सः) वह संन्यासी (अग्निः) के तुल्य (नः) हम गृहस्थों की वा (अमात्यम्) उत्तम मन्त्री की और (वेदः) धन की (विश्वतः) सब ओर से (रक्षतु) रक्षा करे (उत) और (अस्मान्) हमारी (अंहसः) दुष्टाचरण वा अपराध से (पातु) रक्षा करे ॥३॥
Essence
गृहस्थ लोग ऐसी इच्छा करें कि संन्यासी जन हमको ऐसा उपदेश करे कि जिससे हम लोग धन के रक्षक हुए अधर्म के आचरण से पृथक् रहें ॥३॥
Subject
फिर वे दोनों परस्पर क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥