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Rigveda Mandal 7 / Sukta 15 / Mantra 1

104 Sukta
15 Mantra
7/15/1
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒प॒सद्या॑य मी॒ळ्हुष॑ आ॒स्ये॑ जुहुता ह॒विः। यो नो॒ नेदि॑ष्ठ॒माप्य॑म् ॥१॥

उ॒प॒ऽसद्या॑य । मी॒ळ्हुषे॑ । आ॒स्ये॑ । जु॒हु॒त॒ । ह॒विः । यः । नः॒ । नेदि॑ष्ठम् । आप्य॑म् ॥

Mantra without Swara
उपसद्याय मीळ्हुष आस्ये जुहुता हविः। यो नो नेदिष्ठमाप्यम् ॥

उपऽसद्याय। मीळ्हुषे। आस्ये। जुहुत। हविः। यः। नः। नेदिष्ठम्। आप्यम् ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 18 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (नः) हमारे (नेदिष्ठम्) अति निकट (आप्यम्) प्राप्त होने योग्य को प्राप्त होता है उस (उपसद्याय) समीप में स्थापन करने योग्य (मीळ्हुषे) जल से जैसे, वैसे सत्य उपदेशों से सींचनेवाले के लिये (आस्ये) मुख में (हविः) देने योग्य वस्तु को (जुहुत) देओ ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो यति समीप प्राप्त हो उसका तुम सब लोग सत्कार करो और अन्नादि का भोजन कराओ ॥१॥
Subject
अब पन्द्रहवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में अतिथि कैसा हो, इस विषय को कहते हैं ॥