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Rigveda Mandal 7 / Sukta 14 / Mantra 3

104 Sukta
3 Mantra
7/14/3
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ नो॑ दे॒वेभि॒रुप॑ दे॒वहू॑ति॒मग्ने॑ या॒हि वष॑ट्कृतिं जुषा॒णः। तुभ्यं॑ दे॒वाय॒ दाश॑तः स्याम यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥३॥

आ । नः॒ । दे॒वेभिः॑ । उप॑ । दे॒वऽहू॑तिम् । अग्ने॑ । या॒हि । वष॑ट्ऽकृतिम् । जु॒षा॒णः । तुभ्य॑म् । दे॒वाय॑ । दाश॑तः । स्या॒म॒ । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
आ नो देवेभिरुप देवहूतिमग्ने याहि वषट्कृतिं जुषाणः। तुभ्यं देवाय दाशतः स्याम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

आ। नः। देवेभिः। उप। देवऽहूतिम्। अग्ने। याहि। वषट्ऽकृतिम्। जुषाणः। तुभ्यम्। देवाय। दाशतः। स्याम। यूयम्। पात। स्वस्तिऽभिः। सदा। नः ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 17 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य दोषों के जलानेवाले ! आप (देवेभिः) विद्वानों के साथ (नः) हमारे (देवहूतिम्) विद्वानों से स्वीकार की हुई (वषट्कृतिम्) सत्य क्रिया को (जुषाणः) सेवन करते हुए हमको (उप, आ, याहि) समीप प्राप्त हूजिये हम लोग (तुभ्यम्) तुम (देवाय) विद्वान् के लिये (दाशतः) सेवन करनेवाले (स्याम) होवें (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुख क्रियाओं से (नः) हमारी (सदा) सदा (पात) रक्षा करो ॥३॥
Essence
गृहस्थों को चाहिये कि सदैव पूर्ण विद्यावाले संन्यासियों का निमन्त्रण द्वारा प्रार्थना वा सत्कार करें, जिससे वे समीप आये हुए उनकी रक्षा और निरन्तर उपदेश करें ॥३॥ इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से यति और गृहस्थ के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह चौदहवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर गृहस्थ और यति लोग परस्पर कैसे वर्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥