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Rigveda Mandal 7 / Sukta 14 / Mantra 2

104 Sukta
3 Mantra
7/14/2
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
व॒यं ते॑ अग्ने स॒मिधा॑ विधेम व॒यं दा॑शेम सुष्टु॒ती य॑जत्र। व॒यं घृ॒तेना॑ध्वरस्य होतर्व॒यं दे॑व ह॒विषा॑ भद्रशोचे ॥२॥

व॒यम् । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । स॒म्ऽइधा॑ । वि॒धे॒म॒ । व॒यम् । दा॒शे॒म॒ । सु॒ऽस्तु॒ती । य॒ज॒त्र॒ । व॒यम् । घृ॒तेन॑ । अ॒ध्व॒र॒स्य॒ । हो॒तः॒ । व॒यम् । दे॒व॒ । ह॒विषा॑ । भ॒द्र॒ऽशो॒चे॒ ॥

Mantra without Swara
वयं ते अग्ने समिधा विधेम वयं दाशेम सुष्टुती यजत्र। वयं घृतेनाध्वरस्य होतर्वयं देव हविषा भद्रशोचे ॥

वयम्। ते। अग्ने। सम्ऽइधा। विधेम। वयम्। दाशेम। सुऽस्तुती। यजत्र। वयम्। घृतेन। अध्वरस्य। होतः। वयम्। देव। हविषा। भद्रऽशोचे ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 17 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (यजत्र) सङ्ग करने योग्य (होतः) होम करनेवाले (भद्रशोचे) कल्याण के प्रकाशक (देव) दिव्य गुणयुक्त (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्विन् ! जैसे (वयम्) हम लोग (समिधा) ईंधन से अग्नि में होम (विधेम) करें, वैसे (सुष्टुती) श्रेष्ठ प्रशंसा से (ते) तुम अतिथि के लिये (वयम्) हम अन्नादिक (दाशेम) देवें जैसे ऋत्विज् और यजमान लोग (अध्वरस्य) यज्ञ के बीच (घृतेन) घी तथा (हविषा) होमने योग्य द्रव्य से जगत् का हित करते हैं, वैसे (वयम्) हम लोग आप का हित करें। जैसे (वयम्) हम आप की सेवा करें, वैसे आप हमको सत्य उपदेश करें ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे गृहस्थ लोग प्रीति से संन्यासियों की सेवा करें, वैसे ही प्रीति से संन्यासी भी इनके कल्याण के अर्थ सत्य का उपदेश करें ॥२॥
Subject
फिर वे संन्यासी क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥