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Rigveda Mandal 7 / Sukta 14 / Mantra 1

104 Sukta
3 Mantra
7/14/1
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
स॒मिधा॑ जा॒तवे॑दसे दे॒वाय॑ दे॒वहू॑तिभिः। ह॒विर्भिः॑ शु॒क्रशो॑चिषे नम॒स्विनो॑ व॒यं दा॑शेमा॒ग्नये॑ ॥१॥

स॒म्ऽइधा॑ । जा॒तऽवे॑दसे । दे॒वाय॑ । दे॒वऽहू॑तिभिः । ह॒विःऽभिः॑ । शु॒क्रऽशो॑चिषे । न॒म॒स्विनः॑ । व॒यम् । दा॒शे॒म॒ । अ॒ग्नये॑ ॥

Mantra without Swara
समिधा जातवेदसे देवाय देवहूतिभिः। हविर्भिः शुक्रशोचिषे नमस्विनो वयं दाशेमाग्नये ॥

सम्ऽइधा। जातऽवेदसे। देवाय। देवऽहूतिभिः। हविःऽभिः। शुक्रऽशोचिषे। नमस्विनः। वयम्। दाशेम। अग्नये ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 17 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे ऋत्विज् पुरुष और यजमान लोग (समिधा) दीप्ति के हेतु काष्ठ और (हविर्भिः) होम के साधनों और (देवहूतिभिः) विद्वानों ने प्रशंसित की हुई वाणियों के साथ (अग्नये) अग्नि के लिये प्रयत्न करते हैं, वैसे (नमस्विनः) अन्न और सत्कारवाले (वयम्) हम लोग (जातवेदसे) उत्पन्न पदार्थों में विद्यमान (शुक्रशोचिषे) वीर्य्य और पराक्रम से दीप्तिमान् तेजस्वी (देवाय) विद्वान् संन्यासी के लिये अन्नादि पदार्थ (दाशेम) देवें ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे दीक्षित लोग अग्निहोत्रादि यज्ञ में घृत की आहुतियों से होम किये अग्नि से जगत् का हित करते हैं, वैसे ही हम अनियत तिथिवाले संन्यासियों की सेवा से मनुष्यों का कल्याण करें ॥१॥
Subject
अब तीन ऋचावाले चौदहवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में संन्यासी की सेवा कैसे करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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