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Rigveda Mandal 7 / Sukta 13 / Mantra 2

104 Sukta
3 Mantra
7/13/2
Devata- वैश्वानरः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने शो॒चिषा॒ शोशु॑चान॒ आ रोद॑सी अपृणा॒ जाय॑मानः। त्वं दे॒वाँ अ॒भिश॑स्तेरमुञ्चो॒ वैश्वा॑नर जातवेदो महि॒त्वा ॥२॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । शो॒चिषा॑ । शोशु॑चानः । आ । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒पृ॒णाः॒ । जाय॑मानः । त्वम् । दे॒वान् । अ॒भिऽश॑स्तेः । अ॒मु॒ञ्चः॒ । वैश्वा॑नर । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । म॒हि॒ऽत्वा ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने शोचिषा शोशुचान आ रोदसी अपृणा जायमानः। त्वं देवाँ अभिशस्तेरमुञ्चो वैश्वानर जातवेदो महित्वा ॥

त्वम्। अग्ने। शोचिषा। शोशुचानः। आ। रोदसी इति। अपृणाः। जायमानः। त्वम्। देवान्। अभिऽशस्तेः। अमुञ्चः। वैश्वानर। जातऽवेदः। महिऽत्वा ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 16 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य वर्त्तमान तेजस्विन् सन्न्यासिन् ! आप जैसे अग्नि (शोशुचानः) शुद्ध करता और (जायमानः) उत्पन्न होता हुआ (शोचिषा) प्रकाश से (रोदसी) सूर्य भूमिको अच्छे प्रकार पूरित करता, वैसे हम लोगों को (त्वम्) आप (आ, अपृणाः) अच्छे प्रकार पूर्ण कीजिये। हे (वैश्वानर) सब मनुष्यों के नायक (जातवेदः) विद्या को प्राप्त विद्वन् ! (त्वम्) आप (महित्वा) अपनी महिमा से (देवान्) हम विद्वानों को (अभिशस्तेः) सम्मुख प्रशंसा करनेवाले दम्भी से (अमुञ्चः) छुड़ाइये ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे अग्नि आप शुद्ध हुआ सब को शुद्ध करता है, वैसे संन्यासी लोग स्वयं पवित्र हुए सब को पवित्र करते हैं ॥२॥
Subject
फिर वे सन्न्यासी किसके तुल्य क्या करते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥